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PM मोदी ने फिर याद दिलाया Fragile Five, जानिए कौन थे ये 5 देश और क्यों कमजोर मानी गई थी भारत की अर्थव्यवस्था

Fragile Five कोई आधिकारिक संस्था या रैंकिंग नहीं थी. यह नाम मॉर्गन स्टेनली के विश्लेषकों ने 2013 में उन उभरते देशों के लिए इस्तेमाल किया था, जो विदेशी पूंजी पर ज्यादा निर्भर थे और वैश्विक वित्तीय झटकों से जल्दी प्रभावित हो सकते थे.

PM Modi
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 15 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 10:23 AM IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में भारत की अर्थव्यवस्था के बदलाव का जिक्र करते हुए करीब 12 साल पहले के उस दौर को याद किया, जब देश को दुनिया की Fragile Five यानी कमजोर अर्थव्यवस्थाओं वाले पांच देशों में गिना जाता था. 2013 में मॉर्गन स्टेनली ने भारत समेत पांच उभरती अर्थव्यवस्थाओं को इस समूह में रखा था. ये देश थे- भारत, ब्राजील, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका और तुर्किये.

आज भारत की आर्थिक स्थिति उस समय से काफी अलग है. पिछले साल भारत ने जापान को पीछे छोड़कर विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दर्जा हासिल किया। अब यह केवल अमेरिका, चीन और जर्मनी से पीछे है.

2013 में क्यों बना था Fragile Five?
Fragile Five कोई आधिकारिक संस्था या रैंकिंग नहीं थी. यह नाम मॉर्गन स्टेनली के विश्लेषकों ने 2013 में उन उभरते देशों के लिए इस्तेमाल किया था, जो विदेशी पूंजी पर ज्यादा निर्भर थे और वैश्विक वित्तीय झटकों से जल्दी प्रभावित हो सकते थे.

उस समय अमेरिका के फेडरल रिजर्व ने संकेत दिया था कि वह अपने बड़े Quantitative Easing (QE) यानी बॉन्ड खरीद कार्यक्रम को धीरे-धीरे कम कर सकता है. इससे अमेरिकी ब्याज दरें बढ़ने की आशंका पैदा हुई. निवेशकों ने उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिका की ओर लगाना शुरू किया.

भारत के लिए क्यों बढ़ गई थी परेशानी?
उस समय भारत की अर्थव्यवस्था कई मोर्चों पर दबाव में थी. महंगाई ऊंची थी, चालू खाते का घाटा बड़ा था और रुपया तेजी से कमजोर हो रहा था. विदेशी निवेश पर निर्भरता भी ज्यादा थी. चालू खाते का घाटा यानी देश की विदेशी कमाई और विदेशों में होने वाले खर्च के बीच का अंतर. 2012 में भारत का चालू खाते का घाटा GDP के करीब 5.1% तक पहुंच गया था. इसका मतलब था कि देश को अपनी बाहरी जरूरतें पूरी करने के लिए ज्यादा विदेशी पूंजी की जरूरत पड़ रही थी.

इसी दौरान अमेरिकी फेड के टेपर संकेतों के बाद विदेशी निवेशकों के बीच उभरती अर्थव्यवस्थाओं को लेकर चिंता बढ़ी. इसका असर भारतीय रुपये पर भी पड़ा और 2013 में रुपया डॉलर के मुकाबले काफी कमजोर हुआ.

फिर कैसे बदली भारत की तस्वीर?
2013-14 के बाद भारत के बाहरी आर्थिक मोर्चे पर स्थिति बेहतर हुई. चालू खाते का घाटा कम हुआ, विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत हुआ और निवेशकों का भरोसा भी धीरे-धीरे बढ़ा. 2014 में वैश्विक बाजारों में Fragile Five को लेकर तस्वीर पहले की तुलना में काफी सुधर चुकी थी. उस दौर में RBI के गवर्नर रघुराम राजन थे. सोने के आयात को नियंत्रित करने और बाहरी असंतुलन कम करने जैसे कदमों ने भी स्थिति संभालने में मदद की.

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