गणतंत्र दिवस के अवसर पर इस बार दिल्ली का कर्तव्य पथ राजस्थान की शाही विरासत और अनूठी लोककला का साक्षी बनने जा रहा है. पिछले वर्ष गणतंत्र दिवस परेड से बाहर रहने के बाद इस बार राजस्थान की झांकी ने फिर से कर्तव्य पथ पर वापसी की है, जिसे राज्य के लिए सांस्कृतिक सम्मान की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इस वर्ष झांकी में बीकानेर की विश्व प्रसिद्ध सुनहरी उस्ता कला को प्रमुखता से दर्शाया जाएगा, जो अपनी बारीक स्वर्ण नक्काशी और राजसी आभा के लिए जानी जाती है.
चमक वर्षों तक रहती है बनी
ऊंट के शरीर पर की जाने वाली यह कला उस्ता कला कहलाती है, जिसकी शुरुआत ईरान से मानी जाती है और जो मुगल काल में विकसित होकर बीकानेर के राजा राय सिंह के समय यहां पहुंची. इस कला में ऊंट के चमड़े को विशेष प्रक्रिया से तैयार कर उस पर 24 कैरेट सोने की पत्ती और प्राकृतिक रंगों से ‘मुनव्वती’ यानी उभरा हुआ स्वर्ण अलंकरण किया जाता है, जिससे इसकी चमक वर्षों तक बनी रहती है.
मन मोह लेगी यह झांकी
झांकी के अग्रभाग में रावणहत्था वाद्य यंत्र बजाते लोक कलाकार का आकर्षक मूर्तिशिल्प दर्शाया गया है, जो 180 डिग्री घूमता हुआ नजर आएगा. ट्रैक्टर के दोनों ओर उस्ता कला से सजे फ्रेमों में सुराही और लैंप के कलात्मक रूपांकन होंगे, जिनकी ऊंचाई लगभग 13 फीट है. पृष्ठभाग में आगे की ओर घूमती हुई प्रसिद्ध कूपी को दर्शाया गया है. इसके पीछे पारंपरिक हस्तशिल्प कारीगरों को काम करते हुए दिखाया जाएगा. झांकी के अंतिम हिस्से में विशेष अलंकरणों से सजी विशाल ऊंट की प्रतिमा सवार के साथ नजर आएगी, जबकि दोनों ओर चर्मकला के उत्कृष्ट नमूनों को उस्ता कला के मेहराबों में प्रदर्शित किया गया है. झांकी के साथ-साथ लोकनृत्य प्रस्तुत करते कलाकार इसकी जीवंतता को और बढ़ाएंगे. हर साल 26 से 31 जनवरी तक आयोजित होने वाले भारत पर्व और गणतंत्र दिवस परेड में राजस्थान की यह झांकी प्रदेश की सांस्कृतिक समृद्धि और पारंपरिक शिल्पकला को राष्ट्रीय मंच पर मजबूती से प्रस्तुत करेगी.