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Bihar Education: बगल में आलीशान बीएड कॉलेज, और झोपड़ी में जमीन पर पढ़ते बच्चे! समस्तीपुर से आई शिक्षा व्यवस्था की रुला देने वाली तस्वीर

बिहार के समस्तीपुर शहर में एक प्राथमिक विद्यालय बीएड कॉलेज के पास झोपड़ी में चल रहा है. यहां दलित बस्ती के बच्चे बिना बेंच-डेस्क और शौचालय के ज़मीन पर बैठकर पढ़ते हैं, और बारिश में टपकती छत के कारण स्कूल की छुट्टी करनी पड़ती है.

बिहार के शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाती तस्वीर
जहांगीर आलम
  • समस्तीपुर,
  • 01 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 4:39 PM IST

बिहार में बड़े तामझाम के साथ प्रखंडों में डिग्री कॉलेज खोले जा रहे हैं और रंग-रोगन कर स्कूलों को मॉडल स्कूल बनाने की बात हो रही है. लेकिन जहां से छात्रों का भविष्य बनता है, उस स्कूल का समस्तीपुर शहर में क्या हाल है, ये तस्वीरें खुद बयां कर रही हैं. शहर के बीचों-बीच स्थित प्राथमिक विद्यालय बीएड कॉलेज झोपड़ीनुमा भवन में चल रहा है. यहां न बेंच-डेस्क है और न ही बच्चों के लिए जरूरी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं.

झोपड़ी में पढ़ते हैं दलित बस्ती के बच्चे
समस्तीपुर शहर के बीएड कॉलेज मोहल्ले में सड़क किनारे एक झोपड़ी में प्राथमिक विद्यालय चलता है. इस स्कूल में ज्यादातर दलित बस्ती के बच्चे पढ़ते हैं. यहां कक्षा 1 से लेकर 5 तक की पढ़ाई होती है. मजबूरी ऐसी है कि बच्चे झोपड़ीनुमा स्कूल में जमीन पर बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं. स्कूल के ठीक बगल में बीएड कॉलेज की इमारत खड़ी है, जो इन बच्चों की बदहाली को जैसे मुंह चिढ़ाती नजर आती है. शिक्षक भी उपलब्ध संसाधनों में किसी तरह बच्चों को पढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.

दो कमरों में चलती है पांच कक्षाओं की पढ़ाई
इस झोपड़ीनुमा स्कूल में दो कमरे बने हुए हैं. एक कमरे में कक्षा 1 से 3 तक के बच्चों की पढ़ाई एक साथ होती है, जबकि दूसरे कमरे में कक्षा 4 और 5 के बच्चों को पढ़ाया जाता है. यानी दो कमरों में कक्षा 1 से 5 तक की पढ़ाई चल रही है. स्कूल में बच्चों के बैठने के लिए बेंच तक नहीं है. इतना ही नहीं, यहां ढंग का ब्लैकबोर्ड भी उपलब्ध नहीं है.

बारिश में टपकता है पानी, देनी पड़ती है छुट्टी
स्कूल की हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बारिश होने पर क्लासरूम में पानी टपकने लगता है. ऐसे में मजबूरी में बच्चों की छुट्टी करनी पड़ती है. गर्मी के मौसम में भी बच्चों और शिक्षकों को परेशानी होती है. स्कूल में पंखे की व्यवस्था नहीं है. गर्मी से राहत पाने के लिए स्कूल की टीचर हाथ का पंखा झलती नजर आती हैं, जबकि बच्चे अपनी कॉपी-किताब से हवा करके गर्मी से बचने की कोशिश करते हैं.

न शौचालय की सुविधा, न दूसरी मूलभूत व्यवस्था
स्कूल में शौचालय तक की व्यवस्था नहीं है. ऐसे में बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों के लिए भी परेशानी उठानी पड़ती है. स्कूल की पूरी तस्वीर ऐसी है कि यहां पढ़ने वाले बच्चों की स्थिति खुद-ब-खुद सामने आ जाती है. देश के भविष्य कहे जाने वाले ये छात्र आज भी जमीन पर बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं.

स्कूल के प्रधानाध्यापक भी हो चुके हैं निराश
प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक विश्वजीत झा अब स्कूल की स्थिति को लेकर निराश हैं. उनका कहना है कि उन्हें उम्मीद थी कि स्कूल में सुधार होगा, लेकिन अब दूर-दूर तक सुधार होता नजर नहीं आ रहा है.

प्रधानाध्यापक के मुताबिक, शिक्षा विभाग के अधिकारियों से जब भी बात की गई तो एक ही जवाब मिला कि स्कूल को किसी दूसरे विद्यालय में विलय कर दिया जाए. लेकिन इस स्कूल में खासकर दलित बस्ती के बच्चे पढ़ते हैं और उनके अभिभावक अपने बच्चों को करीब 2 किलोमीटर दूर दूसरे स्कूल में भेजने को तैयार नहीं हैं.

पहले स्कूल के लिए जमीन देने का दिया गया था आदेश
प्रधानाध्यापक विश्वजीत झा ने बताया कि पूर्व डीएम नवीन चन्द्र झा ने आदेश दिया था कि जमीन देकर इस स्कूल का निर्माण कराया जाए. लेकिन उनके आदेश के बावजूद स्कूल का निर्माण नहीं कराया जा सका. उन्होंने कहा कि आज 21वीं सदी में भी बच्चों को नीचे बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है. गर्मी में बच्चे परेशान होते हैं और बारिश होने पर मजबूरी में छुट्टी देनी पड़ती है. उन्होंने सरकार से इस विद्यालय की स्थिति पर भी ध्यान देने का आग्रह किया.

शिक्षिका बोलीं- एक झोपड़ी में चलती हैं तीन कक्षाएं
स्कूल की शिक्षिका ने बताया कि एक झोपड़ी में तीन कक्षाएं चल रही हैं और इसी व्यवस्था में किसी तरह बच्चों को पढ़ाने की कोशिश की जाती है. उनका कहना है कि कई डीएम आए और चले गए, लेकिन किसी ने स्कूल का निर्माण कराने की दिशा में कदम नहीं उठाया. शिक्षिका के मुताबिक, स्कूल के बगल में बीएड कॉलेज की काफी खाली जमीन है, लेकिन इसके बावजूद शिक्षा विभाग की ओर से स्कूल के लिए जमीन नहीं मिल सकी. ऐसे में शिक्षक खुद परेशानी उठाकर बच्चों को पढ़ा रहे हैं और बच्चे भी इसी बदहाल व्यवस्था में पढ़ने को मजबूर हैं.
 

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