आज भी समाज के कई हिस्सों में बेटियों को लेकर पुरानी सोच की नजरिया देखने को मिलता है. कहीं बेटी के जन्म पर मायूसी छा जाती है तो कहीं बेटियों को जन्म से ही बोझ समझ लिया जाता है. ऐसे समय में सावन के पावन महीने में मुंगेर के असरगंज स्थित कच्ची कांवरिया पथ के पास से सामने आई एक तस्वीर लोगों का दिल जीत रही है. सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर बाबा बैजनाथ धाम जाने वाले एक पिता ने अपनी दो माह की नवजात बेटी को भगवान का आशीर्वाद मानते हुए उसे साथ लेकर दंडवत यात्रा शुरू की है. यही नहीं, बेटी को धूप और गर्मी से बचाने के लिए उन्होंने उसके लिए सोलर पंखे वाली विशेष डोली भी तैयार करवाई है.
बेटी की मन्नत पूरी होने पर निकले दंडवत यात्रा
मुजफ्फरपुर जिले के रहने वाले मिथलेश कुमार अपनी पत्नी रेखा देवी, तीन साल के बेटे आयुष और महज दो माह की बेटी राधा कुमारी के साथ दंडवत यात्रा कर रहे हैं. मिथलेश ने बताया कि वह पिछले छह वर्षों से बाबा बैजनाथ धाम की दंडवत यात्रा करते आ रहे हैं. उनके परिवार के सभी भाइयों के यहां बेटियां थीं, लेकिन उनके यहां केवल एक बेटा था. उन्होंने बाबा से पुत्री प्राप्ति की कामना की थी. मन्नत पूरी हुई और उनके घर राधा के रूप में बेटी ने जन्म लिया. इसके बाद उन्होंने संकल्प लिया कि वह अपनी नवजात बेटी को साथ लेकर बाबा के दरबार तक दंडवत यात्रा करेंगे.
बेटी के लिए बनवाई सोलर पंखे वाली विशेष डोली
दो माह की मासूम बच्ची को यात्रा में किसी तरह की परेशानी न हो, इसके लिए मिथलेश ने करीब 10 हजार रुपये खर्च कर एक विशेष डोली तैयार करवाई. डोली के ऊपर सोलर प्लेट लगाई गई है, जिससे पंखा चलता है और यात्रा के दौरान बच्ची को धूप और गर्मी से राहत मिलती है. परिवार के कई लोगों ने इतनी छोटी बच्ची को यात्रा पर ले जाने से मना किया, लेकिन मिथलेश अपने संकल्प पर अडिग रहे.
'बेटी भाग्य से नहीं, सौभाग्य से मिलती है'
मिथलेश कुमार का कहना है कि 'बेटी भाग्य से नहीं, सौभाग्य से मिलती है.' उनका सपना है कि वह अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर डॉक्टर बनाएं. उनका मानना है कि बेटियां परिवार की सबसे बड़ी ताकत होती हैं और माता-पिता की सेवा में हमेशा सबसे आगे रहती हैं. उनके लिए यह यात्रा सिर्फ धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि बेटी के सम्मान और उसके उज्ज्वल भविष्य का संकल्प भी है. सावन की इस यात्रा में मिथलेश कुमार का यह कदम सिर्फ उनकी श्रद्धा तक सीमित नहीं है. यह उन लोगों के लिए भी एक संदेश है, जो आज भी बेटियों और बेटों में फर्क करते हैं. ये परिवार ऐसे परिवारों के लिए सबक है कि माता-पिता के लिए संतान केवल संतान होती है. यही वजह है कि कच्ची कांवरिया पथ पर यह तस्वीर हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच रही है.