13 साल से बिस्तर पर अचेत पड़ा युवक, सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु की गुहार पर लगाई मुहर

सुप्रीम कोर्ट ने करीब 13 साल से बिस्तर पर अचेत पड़े युवक हरीश राणा की इच्छा मृत्यु की गुहार को मंजूरी दे दी है. साल 2013 में चंडीगढ़ में रह कर पढ़ाई कर रहे हरीश अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे. इससे उनके सिर में गंभीर चोटें आईं थी. उसके बाद से वह लगातार बिस्तर में अचेत हालत में हैं.

SC approves euthanasia
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 11 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 1:27 PM IST

उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद के अपने घर में बीते करीब 13 साल से बिस्तर पर अचेत पड़े युवक हरीश राणा की इच्छा मृत्यु यानी पैसिव युथनेशिया देने की गुहार पर अपनी मंजूरी की मुहर लगाते सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि AIIMS के पैलिएटिव केयर में उसे भर्ती किया जाएगा, ताकि मेडिकल ट्रीटमेंट वापस लिया जा सके. फिर हरीश प्राकृतिक रूप से जब तक सांस ले सकें, यह प्रकृति पर ही छोड़ दिया जाए.

इच्छा मृत्यु पर SC का अहम फैसला-
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने सरकार से भी कहा कि वो इस गरिमा के साथ जीवन और मृत्यु को लेकर बनने वाली ऊहापोह की स्थिति पर कानून बनाकर दिशा दिखाए.  कोर्ट ने कहा कि ये निश्चित किया जाना चाहिए कि गरिमा के साथ जीवन की तरह ही गरिमा के साथ मृत्यु की प्रक्रिया भी पूरी की हो.

हरीश के ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं- कोर्ट
कोर्ट ने कहा कि सुनवाई के दौरान हमने उनके घरवालों से बात भी की थी. हादसे के बाद से जो 100 फीसदी दिव्यांगता के शिकार हो चुके बेटे के ठीक होने की उम्मीद वो छोड़ चुके हैं. हरीश के माता-पिता ने ही उसे इच्छा मृत्य देने की मांग की है. एम्स की रिपोर्ट के मुताबिक हरीश के ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है. 

जस्टिस पारदीवाला ने कहा था कि यह बेहद दुःखद रिपोर्ट है. यह हमारे लिए मुश्किल फैसला है. पर हम इस लड़के को यूँ अपार दुःख में नहीं रख सकते. हम उस स्टेज में है जहाँ आज हमें आखिरी फैसला लेना होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने भावुक निर्णय सुनाते हुए जीवन, मृत्यु और कानून के बीच गरिमा की महीन विभाजन रेखा खींची.

जस्टिस पारदीवाला ने जीवन और मृत्यु की सच्चाई को भावुकता से भरे निर्णय को भावपूर्णता के साथ पढ़ने की शुरुआत पश्चिमी दार्शनिक हेनरी के कथन से की कि ईश्वर जीवन देता है. हम उसे कृतज्ञता के साथ स्वीकार करते हैं. फिर जीवन में कई उतार चढ़ाव आते हैं और हम खुद को दोराहे पर खड़ा पाते हैं. ऐसे में शेक्सपियर को उद्धृत करते हुए जस्टिस पारदीवाला ने पढ़ा कि टू बी ओर नॉट टू बी यानी करो या मरो की ऊहापोह वाली स्थिति होती है.

वहीं, जस्टिस विश्वनाथन ने राणा परिवार के समर्पण, प्रेम, चिंता और डर की बात करते हुए चिंता और चिता का सुभाषित श्लोक उद्धृत किया कि चिंतायश्च चितायाश्च विंदुमात्रं विशिष्यते।
चिता दहति निर्जीव चिंता दहति जीवनं।।
चिंता और चिता इन शब्दों में केवल एक बिन्दु का फ़र्क है. किंतु चिता निर्जीव शरीर को जलाती है, और चिंता जीवन को ही जलाती है.
चिता मरे को जलाती है. लेकिन चिंता जीवित को ही जला देती है.

साल 2013 में हुआ था हादसा-
चंडीगढ़ में रह कर पढ़ाई कर रहे हरीश 2013 में अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे. इससे उनके सिर में गंभीर चोटें आईं थी. उसके बाद से वह लगातार बिस्तर में अचेत हालत में है. लगातार बिस्तर पर पड़े रहने के कारण उनके शरीर पर घाव बन गए हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के परिवार की प्रंशंसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि उनके परिवार ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा. किसी से प्यार करने का मतलब है सबसे बुरे समय में भी उनकी देखभाल करना. सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी CMO को एक पैनल बनाने को कहा है. इस फैसले को लेकर क्या हुआ इस मसले पर चार हफ्ते बाद सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई.

(संजय शर्मा की रिपोर्ट)

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