खेल-खेल में कलात्मक गतिविधियों द्वारा बच्चो को कैसे संस्कारित करना है यह पुराने लोग अच्छी तरह जानते हैं. शायद तभी कुछ ऐसे अवसर जुटाए गए हैं जिन पर बालक-बालिकाए टेसू-झेंझी खेल खेलते हैं. जिसको लेकर कुम्भ्कारो ने टेसू-झेंझी को कई रूपों में बनाया है और बाजार सज गए हैं. यूं तो यह खेल अधिकांश उत्तर भारत में लोक प्रिय है परन्तु बृज,बुन्देलखंड में इनकी अपनी ही छठा है. टेसू-झेंझी का खेल धौलपुर,मुरैना,ग्वालियर और आस-पास के इलाके में बड़े पैमाने पर खेला जाता है. टेसू-झेंझी खेलने की प्रथा अब धीरे-धीरे कम होती जा रही है जिसके चलते खेलते समय गाए जाने वाले गीत भी कम सुनने को मिलते है.
दशहरे से शुरू होकर शरद पूर्णिमा पर होता है समापन
टेसू-झेंझी का त्योहार उत्तर भारत में काफी पुराना है. खासकर ब्रज और बुंदेलखंड में इस परंपरा की अलग पहचान है. धौलपुर, मुरैना और ग्वालियर जैसे इलाकों में बच्चे दशहरे के आसपास टेसू-झेंझी लेकर घर-घर जाते हैं. इस दौरान वे लोकगीत गाते हैं और लोगों से अनाज या पैसे मांगते हैं. दशहरे पर टेसू-झेंझी को जलाने की परंपरा है, जबकि शरद पूर्णिमा के दिन दोनों का विवाह कराकर विसर्जन किया जाता है.
कभी चार फीट तक के बनते थे टेसू
इस त्योहार के लिए कुम्हार मिट्टी से टेसू और झेंझी की अलग-अलग तरह की आकृतियां बनाते हैं. पहले चार फीट तक के टेसू भी बनाए जाते थे और लोग बड़े टेसू खरीदने के लिए उत्साहित रहते थे. बच्चे इनके साथ खेलते हुए पारंपरिक गीत गाते थे. धौलपुर में 'मेरा टेसू झंई अड़ा, खाने को मांगे दही बड़ा' जैसे गीत काफी मशहूर हैं. हालांकि, शहरों में आधुनिक जीवनशैली के चलते यह परंपरा कमजोर पड़ रही है. गांवों में अब भी इसे किसी तरह जिंदा रखा गया है.
महाभारत से जुड़ी है टेसू-झेंझी की प्रेम कहानी
भागवताचार्य लोकेन्द्र शास्त्री के अनुसार, टेसू-झेंझी की परंपरा महाभारत से जुड़ी मानी जाती है. लोक मान्यता के मुताबिक, टेसू को बर्बरीक कहा जाता था, जो घटोत्कच के पुत्र और भीम के पौत्र थे. बर्बरीक ने अपनी मां को वचन दिया था कि वे युद्ध में हारने वाली सेना की ओर से लड़ेंगे. मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों की जीत सुनिश्चित करने के लिए उनका सिर काट दिया था. हालांकि, वरदान के कारण उनका सिर जीवित रहा. कहानी के अनुसार, बर्बरीक को झेंझी से प्रेम हो गया था और उन्होंने युद्ध से लौटकर उससे विवाह करने का वचन दिया था. लेकिन उनकी मृत्यु के बाद यह विवाह नहीं हो सका. झेंझी उनके लौटने का इंतजार करती रही. लोक मान्यता में टेसू-झेंझी के विवाह की परंपरा को इसी प्रेम कहानी से जोड़कर देखा जाता है.
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