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Delhi: अब लाल किले में मॉडर्न रूप में देखिए भारत की पारंपरिक कला, देश-दुनिया के सामने विलुप्त होती कला को नई पहचान देने की पहल 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 दिसंबर 2023 को आत्मनिर्भर भारत सेंटर फॉर डिजाइन का लाल किला परिसर L1 बैरक में उद्घाटन किया था. यहां 17 अलग-अलग कलाओं को एक साथ लाया गया है. 

भारत की पारंपरिक कला
अनामिका गौड़
  • नई दिल्ली,
  • 13 दिसंबर 2023,
  • अपडेटेड 10:54 PM IST
  • 10 से ज्यादा राज्यों से कारीगर अपनी कला दिखाने आए
  • आंध्र प्रदेश की सबसे प्राचीन हस्त कला है टोलुबुम्ला 

भारत की पारंपरिक कला देखने के आप शौकिन हैं तो आइए दिल्ली स्थित लाल किया. जी हां, यहां लाल किला परिसर में भारत के अलग-अलग राज्यों की पारंपरिक कलाओं को एक छत के नीचे लाकर दुनिया के सामने रखने की एक कोशिश की गई है. आत्मनिर्भर भारत के तहत देश से वे कारीगर, जिनकी कला विलुप्त होती जा रही है, उन्हें कंटेंपरेरी डिजाइनर के साथ जोड़कर उनकी विलुप्त होती कला को दुनिया के सामने नई पहचान देने की शुरुआत की गई है.

17 अलग-अलग कलाओं को एक साथ लाया गया
प्रधानमंत्री मोदी ने 8 दिसंबर को आत्मनिर्भर भारत सेंटर फॉर डिजाइन का लाल किला परिसर L1 बैरक में उद्घाटन किया था. यहां 17 अलग-अलग कलाओं को एक साथ लाया गया है. फिलहाल 10 से ज्यादा राज्यों से कारीगरों को इस सेंटर में अलग-अलग कंटेंप्रेरी डिजाइन के साथ जोड़कर ऐसे डिजाइन बनाए जा रहे हैं, जो आजकल के समय में पसंद किए जाते हैं और साथ-साथ पुरानी कलाओं को भी जिंदा रख रहे हैं.

कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश
हमारे देश में कई ऐसी पारंपरिक कलाएं हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रहीं हैं. हालांकि वर्तमान समय में उनकी कला को वह पहचान नहीं मिल पाई जो मिलनी चाहिए थी इसलिए कारीगर अपनी कला को छोड़ शहरों में जाकर रोजगार के लिए दूसरे काम करने के लिए मजबूर हो रहे हैं. अब इन कला और कलाकारों के लिए लाल किला के परिसर में आत्मन् के तहत आत्मनिर्भर भारत सेंटर फॉर डिजाइन सेंटर बनया गया है. यह भारत का पहला ऐसा डिजाइन सेंटर है, जहां पर देश के अलग-अलग राज्यों से अलग-अलग कारीगर चाहे वह हस्तकला से जुड़े हुए हों, शिल्प कला से जुड़े हुए हों या बुनकर सभी को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की गई है.

आंध्र प्रदेश की टोलुबुम्ला कला
टोलुबुम्ला आंध्र प्रदेश की सबसे प्राचीन हस्त कलाओं में से एक है. शुरुआती दौर में कागज की कठपुतलियों में अलग-अलग किरदार बनाकर उनका खेल दिखाया जाता था, जिसमें रामायण काल से लेकर छत्रपति शिवाजी महाराज की रोचक कहानी को दिखाया जाता था. उनकी वीर गाथाओं का गुणगान किया जाता था. मगर धीरे-धीरे यह कला विलुप्त होती रही. अब केवल श्री सत्या साईं डिस्टिक दरमावर्म मंडल के कुछ गिने-चुने परिवार ही इस कला को बनाते हैं. आंध्र प्रदेश के इन कारीगरों में कंटेंपरेरी डिसइनर्स के साथ मिलकर अपनी कला को होम डेकोर के सामान बनाने में इस्तेमाल किया है और सुंदर-सुंदर वॉल पेंटिंग बनाई है जिसमें इस पारंपरिक कला को खूबसूरती से देखा जा सकता है.

पश्चिमी बंगाल की शोला पीठ कला
पश्चिम बंगाल में मां दुर्गा को खूबसूरत शोला कारीगर अपनी कला से सजाते हैं. शोला से मां के सिंगर का सामान, खूबसूरत पेड़ बनाए जाते हैं. मगर यह कल पश्चिम बंगाल में ही धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है. ऐसे में इस पारंपरिक कला को दुनिया के सामने रखना के लिए आत्मनिर्भर भारत केंद्र के डिजाइन में लाया गया है ताकि ये कारीगर डिजाइनर के साथ अपनी कला को एक नया रूप देकर इस कला को वेस्ट बंगाल के साथ-साथ पूरे भारत और विश्व में एक नई जगह और पहचान दिला सके.

ओडिशा की पट चित्र कला
ओडिशा में पट चित्रकला को पीढ़ी दर पीढ़ी कारीगर आगे बढ़ते आ रहे हैं. मगर अब राजधानी दिल्ली में डिजाइनर के साथ मिलते ही इस चित्रकला को एक नया स्वरूप दिया गया है. ताश के पत्तों पर पारंपरिक तरीके से चित्रकला करके अलग स्वरूप देके आधुनिक दुनिया के साथ जोड़ने की कोशिश की गई है.

 

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