भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जिला प्रभारी बनाने में जातीय समीकरण के बजाय संगठन कौशल को चुना है. नाराज ब्राह्मणों को संतुष्ट करने की कोशिश भी दिखी. संगठन में काम करने वाले सभी पुराने और बड़े चेहरों की जिला प्रभारी के तौर पर वापसी हुई. संगठन में नए चेहरों को जगह मिली तो सभी पुराने और तपे तपाए वो चेहरे जो सुनील बंसल के समय संगठन के सबसे मजबूत रहे, उन्हें बीजेपी ने जिला प्रभारी के तौर पर काम पर लगा दिया है.
एक तिहाई स्थान ब्राह्मणों को
भाजपा ने जिला प्रभारी की सूची में लगभग एक तिहाई स्थान ब्राह्मणों को दी है. 98 जिला प्रभारियों में 29 ब्राह्मण हैं. दूसरे नंबर पर ओबीसी हैं, जिन्हें 25 जिले मिले और तीसरे नंबर पर ठाकुर बिरादरी है, जिनके 18 जिला प्रभारी बनाए गए. सबसे कम दलित चेहरे जिला प्रभारियों में दिखे और महिलाओं की भागीदारी भी सिर्फ उंगलियों पर गिनने वाली ही है. जिला प्रभारियों में महिलाओं की संख्या तो दलितों से भी कम है. 98 में सिर्फ 4 महिलाएं हैं. 5 दलित जबकि 13 जिले बनिया बिरादरी को मिली है.
सुनील बंसल की टीम के सदस्यों की वापसी
दरअसल, बीजेपी ने 2027 विधानसभा चुनाव को देखते हुए 2014 से 2024 तक के सभी वे चेहरे, जो संगठन में पूरी तरीके से घुल मिल गए, कई बार के प्रदेश के मंत्री, महामंत्री प्रदेश सचिव और अलग-अलग मोर्चों और दूसरे संगठनों में बड़े और अहम पदों पर रहे, उन्हें जिला प्रभारी बनाकर उनके अनुभव का इस्तेमाल करेगी. इस लिस्ट में सभी वे चेहरे हैं जिन्हें सुनील बंसल की टीम कहा जाता रहा. अनूप गुप्ता, कमलेश मिश्रा, संतोष सिंह, चंद्र मोहन, अशोक कटारिया, विजय बहादुर पाठक, सत्येंद्र सिसोदिया, मानवेंद्र सिंह, कौशलेंद्र पटेल, त्रयंबक तपाठी, धर्मेंद्र सिंह, प्रांशु दत्त द्विवेदी जैसे चेहरों को जिला प्रभारी बनाया गया है. जिला प्रभारी में 9 लोग एमएलसी हैं, जिन्हें जिलों का प्रभार दिया गया है.
बीजेपी संघटनात्मक एजेंडे को दे रही धार
बीजेपी लगातार अपने संघटनात्मक एजेंडे को धार दे रही है. उसी क्रम में शनिवार रात बीजेपी ने संघटनात्मक दृष्टि से बनाए अपने 98 जिलों के जिला प्रभारी का ऐलान कर दिया, लेकिन इस लिस्ट को देखकर ऐसा लगता है कि भाजपा ने एक तरफ ब्राह्मणों को साधने की कोशिश की है तो दूसरी तरफ दलित और महिलाएं इस लिस्ट में सबसे नीचे हैं. अगर जिला प्रभारी के आंकड़ों पर ध्यान दें तो महिलाओं की संख्या तो दलितों से भी काम है. 98 में सिर्फ चार महिलाएं और पांच दलित ही अपनी जगह बना पाए हैं.
अहम है जिला प्रभारी का पद
जिला प्रभारी संगठनात्मक दृष्टि से अहम होता है और जिला अध्यक्ष के ऊपर दृष्टि रखने वाला संगठन का व्यक्ति माना जाता है. जो स्थान उत्तर प्रदेश प्रभारी के तौर पर विनोद तावडे की है, कुछ वैसी ही पोजीशन जिला प्रभारी की होगी, जो जिले में होने वाले सभी सांगठनिक कार्यों पर नजर रखेंगे.
साध लिया है अनुभव को
दरअसल, बीजेपी के सामने इस बार समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के एलायंस की तरफ से गंभीर चुनौती मिल रही है. अखिलेश के PDA की चर्चा जमीन पर है और बीजेपी के विधायकों और जनप्रतिनिधियों को लेकर लोगों में खासी नाराजगी है. एंटी इनकंबेंसी भी वर्तमान विधायकों के खिलाफ काफी ज्यादा है. ऐसे में भाजपा अपने सभी पुराने नेताओं को साध कर चलना चाहती है. लंबे समय से जमे जमाए ये चेहरे इस बार संगठन से बाहर हो गए थे, ऐसे में जिला प्रभारी बनाकर एक तरफ इन्हें समायोजित किया गया है. दूसरे तरफ किसी तरह की नाराजगी न पनपे इसका भी ख्याल रखा गया है. सबसे बड़ी बात की लगातार भाजपा की जीत दिलाने में यह सभी चहरे अहम रहे हैं. ऐसे में बेशक जातीय संतुलन बीजेपी जिला प्रभारी में नहीं साध पाई लेकिन 2027 चुनाव के लिहाज से अनुभव को साध लिया है.