Advertisement

Uttarakhand Patti Mela Pauri Garhwal: 15 मीटर ऊंचा चिकना पेड़, ऊपर टंगे फल और पैसे... पौड़ी के 'पत्ती मेले' में दिखा रोमांच; जानें मां नंदा से जुड़ी अनोखी परंपरा

उत्तराखंड के पौड़ी जिले के थलीसैंण में पारंपरिक 'पत्ती मेले' का आयोजन हुआ. मां नंदा की विदाई से जुड़े इस मेले में 15 मीटर ऊंचे चिकने चीड़ के पेड़ पर चढ़कर इनाम हासिल करने की साहसिक प्रतियोगिता मुख्य आकर्षण रही.

अनोखी परंपरा
gnttv.com
  • पौड़ी,
  • 21 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 6:22 PM IST

पौड़ी जिले के थलीसैंण विकासखंड में इस साल भी पारंपरिक पत्ती मेले का आयोजन किया गया. कपरोली, बालसिम, पनाऊ और ग्वीठगांव में लगे इस मेले में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए. मेले की शुरुआत मां नंदा के जागरों और धार्मिक अनुष्ठान के साथ हुई. इसके बाद मेले में होने वाली खास प्रतियोगिता ने लोगों का ध्यान खींचा. पत्ती मेले का सबसे आकर्षक हिस्सा करीब 15 मीटर लंबे चीड़ के खड़े पेड़ पर चढ़ने की प्रतियोगिता होती है. इसके लिए पेड़ को पूरी तरह चिकना और फिसलन भरा बनाया जाता है. इसके बाद पेड़ के सबसे ऊपर पत्तियां, पहाड़ी फल और कुछ पैसे रखे जाते हैं.

ऊपर पहुंचने वाला बनता है विजेता
प्रतियोगिता में जो प्रतिभागी फिसलन भरे पेड़ पर चढ़कर उसके सबसे ऊपरी हिस्से तक पहुंच जाता है और वहां रखा सामान हासिल कर लेता है, उसे विजेता माना जाता है. पेड़ के ऊपर रखा सामान ही उसके लिए इनाम होता है. हालांकि, इस चुनौती को पूरा करना इतना आसान नहीं होता. पेड़ पर चिकनाहट और फिसलन होने की वजह से प्रतिभागियों के लिए ऊपर चढ़ना काफी मुश्किल होता है. कई बार लोग कुछ ऊंचाई तक पहुंचने के बाद वापस नीचे फिसल जाते हैं. ऐसे में वर्षों से इस परंपरा को देखने और इसमें हिस्सा लेने वाले अनुभवी लोग ही इस चुनौती को पूरा कर पाते हैं.

मां नंदा की विदाई से जुड़ी है परंपरा
ग्रामीणों के अनुसार, पत्ती मेला सिर्फ मनोरंजन या प्रतियोगिता तक सीमित नहीं है. इसके पीछे धार्मिक और कृषि से जुड़ी मान्यता भी है. ग्रामीणों का कहना है कि मां नंदा की विदाई के अवसर पर इस मेले का आयोजन किया जाता है. मान्यता है कि मां नंदा को अलग-अलग तरह की सब्जियां, अनाज और पहाड़ी उपज अर्पित करने से गांव की फसलें सुरक्षित रहती हैं और अच्छी पैदावार होती है. इसी आस्था के साथ ग्रामीण अपने खेतों में पैदा होने वाली विभिन्न फसलों और अनाज को मां नंदा को समर्पित करते हैं.

मेले में ग्रामीणों की बड़ी संख्या में भागीदारी रही. पत्ती मेले की यह खास प्रतियोगिता सूर्यास्त के बाद समाप्त कर दी जाती है. इस तरह धार्मिक आस्था, कृषि परंपरा और रोमांच से जुड़ा यह अनोखा आयोजन आज भी पहाड़ की लोक संस्कृति और पारंपरिक मान्यताओं को जीवंत बनाए हुए है.

(रिपोर्ट- सिद्धांत उनियाल)
 

ये भी पढ़ें

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Advertisement