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गाय-बछड़े की पूजा के साथ शुरू हुआ दीपावली के 5 दिन का उत्सव, किसान परिवार ने निभाई सदियों पुरानी परंपरा

अकोला के घुसर गांव में राजेंद्र पागरुत के परिवार ने पारंपरिक तरीके से वसुबारस मनाया. पूजा के लिए गाय और बछड़े को साफ-सुथरा कर सजाया गया. इसके बाद परिवार के सदस्यों ने उनके माथे पर हल्दी-कुमकुम लगाया और विधि-विधान से पूजा की.

Vasubaras Celebrations
धनंजय साबले
  • अकोला,
  • 05 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 1:59 PM IST

दीपावली की रौनक घरों और बाजारों तक पहुंचे, उससे पहले महाराष्ट्र के गांवों में एक खास परंपरा के साथ त्योहार की शुरुआत हो गई है. अकोला जिले के घुसर गांव में किसान राजेंद्र पागरुत के परिवार ने वसुबारस के मौके पर गाय और बछड़े की पूजा की. परिवार के सदस्यों ने दोनों को हल्दी-कुमकुम लगाया, आरती उतारी और सुख-समृद्धि की कामना की. यह पूजा सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि उस रिश्ते को सम्मान देने का मौका भी है, जो सदियों से भारतीय खेती और पशुधन के बीच रहा है.

पांच दिन तक चलने वाले दीपावली उत्सव का पहला दिन वसुबारस के नाम होता है. इसे गोवत्स द्वादशी भी कहा जाता है. इस दिन गाय और उसके बछड़े की पूजा की जाती है. खासकर महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में किसान परिवार इस पर्व को बड़े उत्साह से मनाते हैं.

गाय-बछड़े की उतारी आरती
अकोला के घुसर गांव में राजेंद्र पागरुत के परिवार ने पारंपरिक तरीके से वसुबारस मनाया. पूजा के लिए गाय और बछड़े को साफ-सुथरा कर सजाया गया. इसके बाद परिवार के सदस्यों ने उनके माथे पर हल्दी-कुमकुम लगाया और विधि-विधान से पूजा की. आरती उतारने के बाद परिवार ने गौ माता के सामने नमन किया और घर में सुख-समृद्धि की कामना की.

इस दौरान परिवार के सभी सदस्य पूजा में शामिल हुए. ग्रामीण जीवन में इस पर्व का खास महत्व है. यहां गाय को केवल दूध देने वाले पशु के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि उसे परिवार और खेती-किसानी का अहम हिस्सा माना जाता है.

बछड़ा बड़ा होकर बैल बनता है, खेती में देता है साथ
किसान परिवार का मानना है कि वसुबारस के साथ ही असल मायनों में दिवाली की शुरुआत होती है. भारत की पहचान लंबे समय तक कृषि प्रधान देश के रूप में रही है और खेती में पशुधन की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है. गाय से मिलने वाला दूध परिवार की जरूरतों को पूरा करता है, वहीं उसका बछड़ा बड़ा होकर बैल बनता है. पारंपरिक खेती में बैल खेत जोतने और दूसरे कृषि कार्यों में किसान की मदद करते रहे हैं. यही वजह है कि किसान परिवारों के लिए गाय और बछड़े की पूजा का धार्मिक होने के साथ-साथ भावनात्मक महत्व भी है.

लोकगीतों से गांवों में दिखने लगा दिवाली का उत्साह
वसुबारस के साथ ही बाजारों और घरों में भी दीपावली की तैयारियां तेज हो गई हैं. महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में इस मौके पर पारंपरिक लोकगीत 'दिन-दिन दिवाली, गाय-म्हैस ओवाली' गाया जाता है. इस गीत में गाय और भैंस के प्रति सम्मान और ग्रामीण जीवन में उनके महत्व की झलक मिलती है.

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