खेतों में Bio Decomposer का छिड़काव करा रही है दिल्ली सरकार, जानें क्या होता है यह और कैसे किसानों को मिलता है फायदा

हर साल खेतों में पराली जलाने के कारण प्रदूषण का समस्या बढ़ जाती है. इसलिए दिल्ली सरकार ने पिछले साल से खेतों में पराली को जलाने की बजाय गलाने के लिए Bio Decomposer का छिड़काव शुरू कराया है.

Spraying Bio Decomposer in Delhi Villages
gnttv.com
  • नई दिल्ली ,
  • 19 अक्टूबर 2022,
  • अपडेटेड 2:01 PM IST
  • बायो डीकंपोजर को दिल्ली के पूसा संस्थान ने बनाया है

दिल्ली सरकार पिछली साल की तरह, इस बार भी किसानों के खेतों में पराली को जलाने के लिए Bio Decomposer का छिड़काव करवा रही है. इससे पराली प्राकृतिक तरीके से गल जाएगी और इसे जलाना नहीं पड़ेगा. आपको बता दें कि इस बायो डीकंपोजर को दिल्ली के पूसा संस्थान ने बनाया है. 

क्या है बायो डी-कंपोजर
पूसा का बनाया बायो डी-कंपोजर सात कवक (Fungi) का मिश्रण है जो धान के भूसे में सेल्यूलोज, लिग्निन और पेक्टिन को पचाने के लिए एंजाइम का उत्पादन करता है. कवक 30-32 डिग्री सेल्सियस पर पनपता है, जो कि धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के समय प्रचलित तापमान है. 
 
कैसे करें खेत में इस्तेमाल 
बायो डी-कंपोजर कैप्सूल का उपयोग करके एक लिक्विड फॉर्मूलेशन बनाया जाता है. और इसे 8-10 दिनों तक फर्मेंट किया जाता है. इसके बाद, खेतों में बची पराली पर मिश्रण का छिड़काव किया जाता है ताकि पराली का तेजी से जैव-अपघटन (Bio Decomposition) हो सके. 

किसान 25 लीटर तरल मिश्रण तैयार करने के लिए 4 बायो डी-कंपोजर कैप्सूल, गुड़ और चने के आटे का इस्तेमाल कर सकते हैं. यह लिक्विड मिक्सचर 1 हेक्टेयर भूमि को कवर करने के लिए पर्याप्त है. पराली गलने की प्रक्रिया को पूरा होने में लगभग 20 दिन लगते हैं. 

क्या हैं इसके फायदे
बहुत से लोगों का सवाल है कि आखिर इसका किसान को क्या फायदा. तो आपको बता दें कि किसान को पराली नहीं जलानी पड़ेगी और इससे प्रदूषण नहीं होगा. और वातावरण अच्छा रहेगा. 

साथ ही, बायो डी-कंपोजर मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता में सुधार करता है क्योंकि पराली गलने के बाद, फसलों के लिए खाद के रूप में काम करती है. खेत की उर्वरता बढ़ने से भविष्य में उर्वरक खपत कम होती जाती है. 

 

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