आखिर क्या है 'जिहादी ड्रग'? 180 करोड़ रुपए की खेप भारत में हुआ बरामद... पूरी दुनिया की एजेंसियों की बढ़ी चिंता

कैप्टागॉन, आज अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ा सिरदर्द बन चुका है. इसे अक्सर 'जिहादी ड्रग' और 'गरीबों का कोकीन' कहा जाता है. वजह है इसका इस्तेमाल, इसकी तस्करी और इससे जुड़ा अरबों रुपये का अवैध नेटवर्क.

आखिर क्या है 'जिहादी ड्रग'
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 16 मई 2026,
  • अपडेटेड 2:50 PM IST

कैप्टागॉन, आज अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ा सिरदर्द बन चुका है. इसे अक्सर 'जिहादी ड्रग' और 'गरीबों का कोकीन' कहा जाता है. वजह है इसका इस्तेमाल, इसकी तस्करी और इससे जुड़ा अरबों रुपये का अवैध नेटवर्क.

कैप्टागॉन का असली नाम फेनेथाइलिन (Fenethylline) था. इसे 1960 के दशक में मेडिकल इस्तेमाल के लिए बनाया गया था. उस समय इसका उपयोग ध्यान संबंधी समस्याओं और नार्कोलेप्सी जैसी बीमारी के इलाज में किया जाता था. लेकिन धीरे-धीरे यह सामने आया कि इस दवा की लत बहुत तेजी से लगती है और इसका गलत इस्तेमाल बढ़ रहा है. इसके बाद दुनिया के कई देशों में इस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया.

हालांकि, अब जो कैप्टागॉन अवैध बाजार में बिक रहा है, वह असली मेडिकल दवा नहीं होता. ज्यादातर गोलियां अवैध लैब में तैयार की जाती हैं और इनमें एम्फेटामाइन, कैफीन, मेथाम्फेटामाइन और दूसरे सिंथेटिक केमिकल्स मिलाए जाते हैं.

घंटों तक जाग सकता है व्यक्ति
इस ड्रग का असर बेहद खतरनाक माना जाता है. इसे लेने वाला व्यक्ति कई घंटों तक जाग सकता है, उसे भूख और थकान कम महसूस होती है, शरीर में अचानक ऊर्जा बढ़ जाती है और आत्मविश्वास भी बढ़ा हुआ महसूस होता है. लेकिन इसके साथ ही यह ड्रग इंसान को आक्रामक, हिंसक और बेहद लापरवाह भी बना सकता है. लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर इसकी गंभीर लत लग जाती है और मानसिक असर भी पड़ता है.

क्यों कहते हैं जिहादी ड्रग
कैप्टागॉन को 'जिहादी ड्रग' कहे जाने की सबसे बड़ी वजह यह है कि पिछले कई वर्षों में अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और मीडिया रिपोर्ट्स में इसके तार युद्ध प्रभावित इलाकों और चरमपंथी नेटवर्क से जुड़ते रहे हैं. दावा किया जाता रहा है कि इस ड्रग का इस्तेमाल लड़ाकों को लंबे समय तक जागे रहने, डर कम महसूस करने और लगातार लड़ाई जैसी परिस्थितियों में सक्रिय रखने के लिए किया जाता था.

कई अंतरराष्ट्रीय जांचों में संघर्ष वाले इलाकों से कैप्टागॉन की गोलियां बरामद होने की बात सामने आई. सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इसकी तस्करी से होने वाली भारी कमाई का इस्तेमाल संगठित अपराध और कुछ चरमपंथी नेटवर्क की फंडिंग में भी किया गया.



क्यों कहा जाता है गरीबों का कोकीन
कम लागत में बनने और भारी डिमांड होने की वजह से इसे 'Poor Man’s Cocaine' यानी 'गरीबों का कोकीन' भी कहा जाता है. अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के मुताबिक कैप्टागॉन का नेटवर्क अब एक बड़े अंतरराष्ट्रीय सिंथेटिक ड्रग कारोबार में बदल चुका है, जिसमें अवैध लैब, केमिकल तस्करी, हवाला नेटवर्क, फर्जी ट्रेड डॉक्यूमेंट, समुद्री रास्तों से सप्लाई और हाईटेक छिपाने के तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं. ड्रग एक्सपर्ट्स का कहना है कि कैप्टागॉन सिर्फ नशे का मामला नहीं, बल्कि यह अब अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, आतंक वित्तपोषण और संगठित अपराध से जुड़ा बड़ा खतरा बन चुका है.

रिपोर्टर: अरविंद ओझा

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