नए मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन के निर्वाचन आयोग द्वारा नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 के ऑनलाइन संस्करण यानी ECInet में किए गए बदलावों को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हुआ है. तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग के दो आयुक्तों, डॉ सुखबीर सिंह संधू और डॉ विवेक जोशी की आपत्ति और मतभेदों की खबरें सामने आने के बाद विवाद तेज हो गया है. इस खुलासे के बाद इसे गैर-कानूनी व अनधिकृत बताया जा रहा है.
दरअसल मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए भरे जाने वाले फॉर्म 6 में बदलाव पर मुख्य रूप से ये आपत्तियां आईं.पोर्टल पर उपलब्ध फॉर्म 6 में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision - SIR से जुड़ा एक नया घोषणा खंड यानी Declaration Part जोड़ दिया गया. इस नए बदलाव के तहत खासकर पहली बार वोट डालने वाले नए आवेदकों से उनके माता-पिता या दादा-दादी के मतदाता सूची में नाम से जुड़े तीन सवाल रखे गए. उनमें से से कोई एक विकल्प चुनने को कहा गया.पहला सवाल कि क्या 2000 के दशक की शुरुआत में हुए SIR के दौरान मतदाता सूची में उनका खुद का नाम था? दूसरा ये कि क्या उस पुरानी लिस्ट में उनके माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी का नाम शामिल था?और तीसरी स्थिति ये कि उस लिस्ट में न तो उनका नाम था और न ही उनके माता-पिता का? तब क्या हो! हालांकि इस सवाल को 'गैर-अनिवार्य' (Non-Mandatory) के रूप में चिह्नित किया गया था. लेकिन इसके बावजूद पोर्टल पर इस घोषणा का जवाब दिए बिना फॉर्म सबमिट नहीं किया जा सकता था.
फॉर्म-6 में बदलाव पर कानूनी सवाल
इन बदलावों पर क्या दोनों चुनाव आयुक्तों ने कई कानूनी आपत्तियां दर्ज करते हुए अपनी असहमति जताई. पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओ.पी. रावत और पूर्व निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा ने भी उन आपत्तियों का समर्थन किया. इन कानूनी और व्यावहारिक ऐतराज में इसे कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन बताया गया. इसे गैर-कानूनी बदलाव भी बढ़ाया गया.इन आयुक्तों का तर्क था कि फॉर्म 6 एक वैधानिक (Statutory) फॉर्म है, जो Registration of Electors Rules, 1960 के तहत तय किया गया है. इस नियम या फॉर्म में कोई भी बदलाव करने के लिए कानून मंत्रालय की अधिसूचना और औपचारिक संशोधन की आवश्यकता होती है. आयोग अपने स्तर पर केवल एक आदेश या दिशा-निर्देश जारी करके इसे बदल नहीं सकता. अपने डिसेंट नोट में निर्वाचन आयुक्त संधू ने आगाह किया था कि इस तरह की अधूरी और अनधिकृत घोषणाएं जोड़ने से युवाओं और पहली बार वोट देने वाले नागरिकों को परेशानी होगी. वे मताधिकार से वंचित भी हो सकते हैं.
आयुक्तों ने डेटाबेस के केंद्रीकरण पर उठाए सवाल
पूर्व CEC ओ.पी. रावत ने भी कहा कि SIR की इस प्रक्रिया ने मतदाताओं के मन में एक तरह का डर पैदा कर दिया है. यह लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है. यह बदलाव उन नए मतदाताओं को कई तरह और रूपों से प्रभावित करता है. यानी जिनके परिवारों के नाम साल 2000 के पुनरीक्षण (SIR) के दौरान किसी वजह से मतदाता सूची में शामिल होने से छूट गए या हटा दिए गए थे उनके सामने तो पीढ़ीगत समस्या खड़ी हो जाएगी. फॉर्म 6 के अलावा आयुक्तों ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि देश के डिजिटल चुनावी डेटाबेस (ECINet और ERONet) का नियंत्रण दिल्ली मुख्यालय में केंद्रित किया जा रहा है. इससे जमीनी स्तर के अधिकारियों (EROs) को पूरा एक्सेस और काम करने की आजादी नहीं मिल पा रही है. इस पूरे मामले में दोनों आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में रिकॉर्ड पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं. हालांकि, निर्वाचन आयोग ने आंतरिक मतभेदों की खबरों को खारिज करते हुए कहा है कि आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है. यहां वैचारिक असहमति, आंतरिक टिप्पणियां और सुझाव आना एक सामान्य प्रक्रिया है. साथ ही चुनावी पुनरीक्षण से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं.
फॉर्म-6 में बदलाव पर सियासत तेज
इस फॉर्म 6 में किए गए बदलाव को लेकर राजनीतिक पार्टियां भी मुखर हो गई हैं. कांग्रेस का कहना है कि इस खुलासे के बाद मुख्य निर्वाचन आयुक्त को एक सेकंड भी अपने पद पर रहने का अधिकार नहीं है. वे तुरंत इस्तीफा दें.कांग्रेस ने कहा कि बीजेपी ने 'लोकतंत्र की हत्या' का दफ़्तर खोल रखा है. सरकार 'डबल-बुलडोजर' चला रही है.मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कामकाज के तानाशाही तरीके की निंदा करते हुए कहा कि उन्होंने संवैधानिक संस्था को बंधक बना लिया है. कांग्रेस प्रवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) सर्वोच्च प्राधिकरण नहीं है. बल्कि ये तो 'समान पदों में प्रथम' है.
अभिषेक मनु सिंघवी बोले- असहमति लोकतंत्र की सुरक्षा
कांग्रेस सांसद और प्रवक्ता सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि असहमति ही लोकतंत्र की सुरक्षा है. असहमति कोई रुकावट नहीं है. उन्होंने दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई असहमति के की सराहना की.कांग्रेस नेता ने कहा कि पारदर्शिता के लिए मांग की कि सभी लिखित असहमति नोट्स (Dissent notes) को सार्वजनिक किया जाना चाहिए. 'जवाबदेही तय करने के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है. सिंघवी ने कहा कि यह सिर्फ एक ही बात की ओर इशारा करता है: सत्ताधारी दल का साम-दाम-दंड-भेद (जैसे भी हो) चुनाव जीतने का जुनून. उन्होंने आगे कहा कि भाजपा यह भी चाहती है कि जहां-जहां उसने जीत हासिल की है, वहां विपक्ष का कोई नामो-निशान न बचे. उन्होंने कहा कि यह दुनिया का इकलौता अनोखा मामला होगा कि पश्चिम बंगाल में औपचारिक विपक्ष सरकार का समर्थन कर रहा है.
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