सफलता केवल संसाधनों की मोहताज नहीं होती, बल्कि इसके लिए आत्मविश्वास और मजबूत संकल्प की आवश्यकता होती है. केरल के कन्नूर जिले की रहने वाली थान्या नाथन सी. ने यह साबित कर दिखाया है. जन्म से पूरी तरह दृष्टिहीन होने के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को कभी धुंधला नहीं होने दिया और केरल न्यायिक सेवा परीक्षा 2025 पास कर जज बनने का गौरव हासिल किया.
थान्या नाथन पूरी तरह दृष्टिबाधित हैं, लेकिन उन्होंने अपनी इस शारीरिक चुनौती को कभी अपनी राह की रुकावट नहीं बनने दिया. उन्होंने केरल ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा 2025 में सफलता हासिल करते हुए दिव्यांग उम्मीदवारों की मेरिट सूची में पहला स्थान प्राप्त किया. उनकी यह उपलब्धि आज समाज के हर वर्ग के लिए प्रेरणा बन गई है.
अपने दम पर पाई सफलता
थान्या की सफलता की खास बात यह है कि उन्होंने परीक्षा की तैयारी के लिए किसी कोचिंग संस्थान का सहारा नहीं लिया. परीक्षा का नोटिफिकेशन जारी होने के बाद उन्होंने खुद से ही परीक्षा की तैयारी की. लगातार मेहनत के बल पर उन्होंने दोनों परीक्षाएं पास कीं.
थान्या ने वर्ष 2024 में वकालत के क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की थी. इसी दौरान उन्होंने न्यायिक सेवा में जाने का लक्ष्य तय किया. साफ लक्ष्य और मेहनत के साथ उन्होंने उसी दिशा में मेहनत शुरू की, जिसका परिणाम आज सबके सामने है.
सुप्रीम कोर्ट का फैसला, तकनीक का साहारा
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिव्यांग उम्मीदवारों को न्यायिक सेवा में अवसर देने संबंधी ऐतिहासिक फैसले ने थान्या जैसे युवाओं के लिए नए द्वार खोले. इसी निर्णय से प्रेरित होकर उन्होंने न्यायिक सेवा परीक्षा देने का फैसला किया और अपनी काबिलियत से शानदार सफलता प्राप्त की.
थान्या का मानना है कि आधुनिक तकनीक ने दृष्टिबाधित लोगों के लिए संभावनाओं के नए रास्ते खोले हैं. स्क्रीन रीडर, वॉइस सॉफ्टवेयर और अन्य सहायक तकनीकी उपकरणों की मदद से न्यायिक कार्यों को भी प्रभावी ढंग से किया जा सकता है.
शिक्षा के हर पड़ाव पर उत्कृष्ट प्रदर्शन
थान्या जन्म से ही दृष्टिबाधित हैं. उन्होंने अपनी शुरुआ़ती शिक्षा विशेष विद्यालय से प्राप्त की, जबकि 10वीं और 12वीं की पढ़ाई सामान्य स्कूलों से पूरी की. इसके बाद उन्होंने कानून के क्षेत्र में कदम रखा और कन्नूर विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई की. वह अपने कॉलेज की एकमात्र दृष्टिबाधित छात्रा थीं और उन्होंने एलएलबी में टॉप भी किया.
थान्या अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता, परिवार के सदस्यों और शिक्षकों को देती हैं. उनका कहना है कि परिवार का लगातार सहयोग और सीनियर्स का मोटिवेशन ही उनके आत्मविश्वास की सबसे बड़ी ताकत बना. उनका मानना है कि दिव्यांग उम्मीदवारों को भले ही अतिरिक्त मेहनत करनी पड़े, लेकिन अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और प्रयास लगातार हों, तो सफलता अवश्य मिलती है.