यूरोप इन दिनों भीषण हीटवेव की चपेट में है. 21 जून के बाद से अब तक 1,300 से ज्यादा मौतें गर्मी से जुड़ी बताई जा रही हैं. फ्रांस में भी सामान्य से करीब 1,000 अधिक मौतें दर्ज हुई हैं. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि भारत में हर साल 44-45 डिग्री, कई जगह 48 डिग्री तक तापमान पहुंच जाता है, तो यूरोप में 43 डिग्री पर इतना हाहाकार क्यों मचा है?
दरअसल इंसान को गर्मी कितनी महसूस होगी और उसका शरीर उस गर्मी को कितना झेल पाएगा, यह कई दूसरे कारकों पर भी निर्भर करता है. यही वजह है कि एक जैसा तापमान भारत और यूरोप में अलग असर दिखा सकता है.
सिर्फ तापमान नहीं, 'फील्स लाइक' भी मायने रखता है
43 डिग्री सेल्सियस का तापमान शरीर के लिए कहीं भी चुनौतीपूर्ण होता है. लेकिन शरीर पर उसका असर इस बात से तय होता है कि आसपास का माहौल कैसा है. अगर हवा नहीं चल रही हो, धूप तेज हो, रात में भी तापमान कम न हो और इमारतें गर्मी रोककर रखें, तो शरीर को ठंडा होने का मौका नहीं मिलता. ऐसे में हीट स्ट्रेस, हीट एग्जॉशन और हीट स्ट्रोक का खतरा तेजी से बढ़ जाता है. यही कारण है कि मौसम विभाग अब केवल तापमान नहीं, बल्कि 'फील्स लाइक' तापमान यानी शरीर को वास्तव में कितनी गर्मी महसूस हो रही है, उस पर भी जोर देता है.
यूरोप की गर्मी भारत से अलग क्यों महसूस होती है?
यूरोप की भौगोलिक स्थिति भारत से अलग है. यह पृथ्वी के काफी उत्तरी हिस्से में स्थित है. वहां गर्मियों में दिन लंबे होते हैं और धूप का पैटर्न भारत से अलग होता है. साफ आसमान होने की वजह से सूरज की किरणें अधिक तीखी महसूस हो सकती हैं.
भारत में कई बड़े शहरों में वायु प्रदूषण धूप की तीव्रता को कुछ हद तक कम कर देता है. प्रदूषण सूर्य की रोशनी को बिखेर देता है, जबकि यूरोप में अपेक्षाकृत साफ वातावरण होने के कारण धूप ज्यादा तेज महसूस हो सकती है.
हवा का न चलना भी बन जाता है बड़ी परेशानी
यूरोप की हालिया हीटवेव में कई इलाकों में हवा लगभग बंद रही. जब हवा नहीं चलती, तो पसीना जल्दी नहीं सूखता और शरीर की गर्मी बाहर निकलने में दिक्कत होती है. इससे घुटन और बेचैनी बढ़ जाती है. भारत में लू चलती है, जो खतरनाक जरूर होती है, लेकिन कई बार हवा के कारण शरीर से निकलने वाली गर्मी बाहर जाने में कुछ मदद भी मिल जाती है. वहीं तटीय इलाकों में नमी अधिक होने से 35 डिग्री तापमान भी बेहद परेशान कर सकता है.
यूरोप के घर सर्दी के लिए बने, गर्मी के लिए नहीं
यूरोप में ज्यादातर घर कड़ाके की सर्दियों को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं. मोटी दीवारें, मजबूत इंसुलेशन, छोटी खिड़कियां और कम वेंटिलेशन घर के अंदर गर्मी को रोककर रखते हैं ताकि सर्दियों में ठंड कम लगे. लेकिन हीटवेव के दौरान यही डिजाइन समस्या बन जाती है. दिनभर की गर्मी घरों के अंदर कैद हो जाती है और रात में भी आसानी से बाहर नहीं निकलती. इससे लोगों को लगातार कई दिनों तक गर्म माहौल में रहना पड़ता है. इसके उलट भारत में कई घरों में पत्थर या टाइल्स की फर्श, खुले आंगन और क्रॉस वेंटिलेशन जैसी व्यवस्थाएं होती हैं, जो घर को अपेक्षाकृत ठंडा रखने में मदद करती हैं.
एयर कंडीशनर की कमी भी बड़ा कारण
भारत में भी हर घर में एसी नहीं है, लेकिन बड़े शहरों में इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. दूसरी ओर यूरोप में लंबे समय तक एसी की जरूरत ही नहीं पड़ती थी. कई देशों में सालभर में मुश्किल से कुछ दिन ही तापमान 25 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाता था. इसी वजह से अधिकांश घर बिना एयर कंडीशनर के बनाए गए. कई शहरों में इमारतों के बाहर एसी लगाने पर भी नियमों के कारण रोक रही, ताकि शहरों की खूबसूरती बनी रहे. अब जब जलवायु परिवर्तन की वजह से हीटवेव लगातार बढ़ रही हैं, तो यूरोप में भी लोग तेजी से एसी लगवाने लगे हैं.
शरीर की आदत भी तय करती है गर्मी का असर
भारत के लोग दशकों से भीषण गर्मी में रहने के आदी हैं. समय के साथ शरीर और जीवनशैली दोनों में कुछ हद तक अनुकूलन हो जाता है. लोग दोपहर में बाहर निकलने से बचते हैं, हल्के कपड़े पहनते हैं, अधिक पानी पीते हैं और अपनी दिनचर्या मौसम के हिसाब से बदल लेते हैं. यूरोप में लंबे समय तक गर्मियां अपेक्षाकृत हल्की रही हैं. ऐसे में अचानक आने वाली 40 डिग्री से ऊपर की हीटवेव वहां के लोगों के शरीर और स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है.
नमी बढ़े तो कम तापमान भी ज्यादा खतरनाक
शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए पसीना निकालता है. जब पसीना त्वचा से उड़ता है, तभी शरीर का तापमान कम होता है. लेकिन अगर हवा में नमी ज्यादा हो, तो पसीना जल्दी नहीं सूखता. इससे शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती. यही वजह है कि कई बार 35 डिग्री तापमान भी 43 डिग्री से ज्यादा तकलीफदेह महसूस हो सकता है. इसलिए मौसम वैज्ञानिक केवल तापमान नहीं, बल्कि 'फील्स लाइक' तापमान को भी स्वास्थ्य के लिहाज से ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं.
भारत की गर्मी भी सुरक्षित नहीं
यह मान लेना गलत होगा कि सिर्फ यूरोप ही गर्मी से परेशान है. भारत में भी हर साल लू और अत्यधिक गर्मी के कारण बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़ते हैं और मौतें भी होती हैं. देश में आज भी करोड़ों लोग टीन की छत वाले घरों में रहते हैं, जहां तापमान बाहर से भी ज्यादा हो जाता है. बड़ी आबादी के पास एयर कंडीशनर नहीं है और कई लोग खुले में काम करने को मजबूर हैं.
ये भी पढ़ें