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49 साल पहले लिया था 300 रुपए घूस, अब हाईकोर्ट ने सजा पर लगाई मुहर, दोषी लेखपाल को जाना होगा जेल

उत्तर प्रदेश के कानपुर में 49 साल पहले 300 रुपए के रिश्वत के मामले में हाईकोर्ट ने आरोपी की रिपोर्ट खारिज कर दी. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोषी चकबंदी लेखपाल को शेष सजा काटने के लिए चार सप्ताह के भीतर निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है.

Lekhpal's conviction upheld in 49-year-old bribery case (Photo/AI)
पंकज श्रीवास्तव
  • प्रयागराज,
  • 07 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 7:19 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 41 साल पुरानी एक आपराधिक अपील को खारिज कर दिया है और चकबंदी लेखपाल की एक वर्ष की सजा को बरकरार रखा है. चकबंदी लेखपाल ने लगभग 49 साल पहले 300 रुपये की रिश्वत ली थी, जो रंगे हाथों पकड़ा गया था. जस्टिस संजीव कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच में ये हुई सुनवाई हुई.

300 रुपए के रिश्वत मामले में अपील खारिज-
हाईकोर्ट ने शेष सजा काटने के लिए चार सप्ताह के भीतर निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है. मामले के अनुसार हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि सतर्कता अधिकारियों और स्वतंत्र सार्वजनिक गवाहों द्वारा जाल बिछाने की कार्यवाही की पूरी तरह से पुष्टि हो जाती है, तो प्राथमिक शिकायतकर्ता की जांच न होना भ्रष्टाचार के मामले के लिए घातक नहीं है. कानपुर की तहसील में चकबंदी विभाग में लेखपाल के पद पर तैनात अपीलकर्ता महेश चंद ने कानपुर के पांचवें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित 1985 के दोषसिद्धि आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की.

ट्रायल कोर्ट ने उन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 161 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 की धारा 5(2) के तहत दोषी पाया था. एक ग्रामीण वीरेंद्र सिंह का उसी गांव की एक महिला के विरुद्ध एक मुकदमा लंबित था. चकबंदी कार्यवाही के दौरान चकबंदी अधिकारी द्वारा दोनों को अलग-अलग चक आवंटित किए गए थे. इसी मामले में एक अपील चकबंदी अधिकारी के समक्ष लंबित थी.

कैसे पड़ा गया था घूसखोर लेखपाल?
1 अप्रैल, 1977 की सुबह, लेखपाल महेश चंद अपीलकर्ता और कानूनगो चंद्र सेन, वीरेंद्र सिंह के साथ उसी बस में सवार हुए और विपक्षी पार्टी की अपील को खारिज करवाने का वादा करते हुए 400 रुपए की रिश्वत की मांग की. वीरेंद्र सिंह ने मौके पर ही कानूनगो को 100 रुपये दे दिए. हालांकि, बाद में उन्होंने कानपुर में अपने बेटे से संपर्क किया. दोनों ने मिलकर कानपुर के सतर्कता विभाग के पुलिस अधीक्षक से मुलाकात की और औपचारिक शिकायत दर्ज कराई. एक सुनियोजित जाल बिछाया गया और 100 रुपये के तीन नोटों पर फिनोलफथेलिन पाउडर से निशान लगाए गए.

उसी दोपहर बाद, वीरेंद्र सिंह ने होटल में महेश चंद को वे तीन करेंसी नोट सौंप दिए, जिन्होंने उन्हें अपनी पैंट की जेब में रख लिया और उनसे कहा कि उनके चक को कोई नुकसान नहीं होगा. सतर्कता दल तुरंत मौके पर पहुंचा, महेश चंद की व्यक्तिगत तलाशी ली और उसके पास से 3 करेंसी नोटों के साथ एक कलाई घड़ी बरामद की. जब उसके हाथों और जेबों को सोडियम कार्बोनेट के घोल से धोया गया, तो वे लाल हो गए. जिससे चिह्नित नोटों के साथ उसके संपर्क की पुष्टि हुई. जबकि निचली अदालत ने सह-आरोपी कानूनगो को बरी कर दिया, वहीं उसने अक्टूबर 1985 में महेश चंद को दोषी ठहराया.

बाद में आरोपी लेखपाल ने जमानत ले ली-
महेश चंद ने बाद में जमानत हासिल कर ली और हाईकोर्ट में अपील दायर की, जो चार दशकों से अधिक समय तक लंबित रही. अपीलकर्ता का तर्क था कि अभियोजन पक्ष का मामला निराधार था ,क्योंकि मुख्य गवाह, शिकायतकर्ता वीरेंद्र सिंह जिससे सीधे रिश्वत की मांग की गई थी, की अदालत में कभी जांच नहीं की गई थी. यह भी तर्क दिया गया कि कथित तौर पर वसूली का स्थान (एक होटल) एक सार्वजनिक स्थान था,
और यह अत्यंत असंभव था कि आरोपी अवैध रिश्वत स्वीकार करने के लिए ऐसे सार्वजनिक स्थान को चुनेगा.

क्या था सरकार का तर्क?
दूसरी ओर राज्य सरकार ने यह तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष ने अपने मामले को संदेह से परे साबित कर दिया है और अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही सुसंगत, विश्वसनीय और भरोसेमंद है. यह भी तर्क दिया गया कि बरामदगी के संबंध में अभियोजन पक्ष द्वारा स्वतंत्र सार्वजनिक गवाहों की जांच की गई थी. हाईकोर्ट ने प्रारंभ में ही यह नोट किया कि यद्यपि शिकायत की जांच नहीं की गई थी, फिर भी उनके बेटे पीडब्ल्यू 4 ने चिकित्सा साक्ष्य प्रस्तुत किया था. जिससे यह साबित होता है कि उनके पिता अस्थिर मानसिक स्वास्थ्य से पीड़ित थे और गवाही देने के लिए अयोग्य थे.

कोर्ट ने खारिज किया आरोपी का तर्क-
जस्टिस संजीव कुमार ने कहा कि पुख्ता सबूतों के आधार पर की गई जालसाजी वाली छापेमारी को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि शिकायतकर्ता गवाही देने के लिए उपस्थित नहीं हो सका. कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थान पर रिश्वतखोरी की संभावना कम होती है.

हाईकोर्ट ने आगे बताया कि अपीलकर्ता ने स्वयं अपने धारा 313 सीआरपीसी के बयान में शिकायतकर्ता के साथ होटल में चाय पीने के लिए उपस्थित होने और वसूली ज्ञापन ( फर्द बारामदगी ) पर हस्ताक्षर करने की बात स्वीकार की थी. उनकी यह दलील कि सतर्कता विभाग द्वारा चलाए गए आक्रामक रिश्वत विरोधी अभियान के कारण उन्हें फंसाया गया था. उसे भी पूरी तरह से अविश्वसनीय और सबूतों के अभाव में खारिज कर दिया गया. इस पृष्ठभूमि में, सतर्कता निरीक्षकों (पीडब्ल्यू 1), कांस्टेबल (पीडब्ल्यू 2) और स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह (पीडब्ल्यू 3) की सुसंगत और विश्वसनीय गवाहियों को विश्वसनीय पाते हुए, हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश और निर्णय को बरकरार रखा.

लेखपाल की सजा बरकरार-
हाईकोर्ट ने इस प्रकार, अपील को खारिज करते हुए महेश चंद के व्यक्तिगत और जमानत बांड रद्द कर दिए. कोर्ट ने उसे आत्मसमर्पण करने और अपनी शेष सजा काटने का आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि यदि वह अनुपालन करने में विफल रहता है, तो निचली अदालत को उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए दंडात्मक उपाय करने का निर्देश दिया गया है.

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