EV vs Flex Fuel: सोच रहे हैं नई कार खरीदने का, तो रुकें.. शोरूम जानें से पहले जान लें.. ईवी और फ्लेक्स फ्यूल के नुकसान

कहने को तो ईवी और फ्लेक्स फ्यूल वाली कार दोनों में अपनी-अपनी खूबी होती है. लेकिन जहां ईवी को लेकर मार्केट काफी खुला है वहीं फ्लेक्स फ्यूल के लिए मार्केट नया है. ऐसे में कौन सी कार खरीदें यह बड़ा सवाल हो जाता है.

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gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 02 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 5:46 PM IST

भारत में पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच लोगों का ध्यान इलेक्ट्रिक (EV) और फ्लेक्स फ्यूल कारों की तरफ खींचा है. सरकार भी पॉल्युशन कम करने के लिए इन दोनों ऑप्शन को बढ़ावा दे रही है. लेकिन नई कार खरीदते समय सिर्फ कम फ्यूल खर्च देखकर फैसला करना सही नहीं होता. दोनों तरह की गाड़ियों के अपने फायदे हैं, लेकिन कुछ ऐसी कमियां भी हैं जिन्हें नजरअंदाज करना भविष्य में भारी पड़ सकता है. चलिए बताते हैं कि इलेक्ट्रिक और फ्लेक्स फ्यूल कारों की कमजोरियां क्या हैं.

कितनी है शुरुआती कीमत 

अगर आपका बजट कम है तो इलेक्ट्रिक कार खरीदना आसान नहीं होगा. इनकी सबसे बड़ी वजह महंगी बैटरी है, जिसकी वजह से इनकी कीमत पेट्रोल या फ्लेक्स फ्यूल कारों से ज्यादा होती है. बेशक सरकार सब्सिडी जरूर देती है, लेकिन इसके बाद भी कई खरीदारों के लिए EV बजट से बाहर हो जाती है. दूसरी ओर फ्लेक्स फ्यूल कारें पेट्रोल कारों की तरह ही होती हैं, इसलिए इनकी कीमत ईवी के मुकाबले कम रहती है.

दोनों में है नेगेटिव प्वाइंट

इलेक्ट्रिक कार को चलाने का खर्च काफी कम माना जाता है, खासकर अगर घर पर चार्जिंग की सुविधा हो. लेकिन जिन लोगों के पास घर में चार्जिंग की सुविधा नहीं है या लंबी दूरी का सफर है, उनके लिए चार्जिंग स्टेशन की न होना बड़ी मुसीबत है.

फ्लेक्स फ्यूल कारें इथेनॉल पर चलती हैं, जो पेट्रोल से सस्ता होता है. हालांकि इथेनॉल पर माइलेज पेट्रोल की तुलना में कम मिलता है. ऐसे में अगर गाड़ी ज्यादा चलती है तो फ्यूल ज्यादा खर्च होता है. साथ ही इथेनॉल हर जगह आसानी से नहीं मिलता.

मेंटेनेंस और फ्यूचर का खर्च

इलेक्ट्रिक कारों में इंजन, गियरबॉक्स और इंजन ऑयल जैसी चीजें नहीं होतीं, इसलिए सर्विसिंग का खर्च कम रहता है. लेकिन कुछ वर्षों बाद अगर बैटरी बदलने की जरूरत पड़ जाए तो यह बहुत महंगा सौदा हो सकता है. बैटरी रिप्लेसमेंट का खर्च कई बार लाखों रुपए तक पहुंच सकता है.

फ्लेक्स फ्यूल कारों में इंजन होता है, इसलिए इनकी सर्विसिंग, इंजन ऑयल और दूसरे पार्ट्स का खर्च जारी रहता है. यानी खरीदने के बाद भी समय-समय पर मेंटेनेंस पर अच्छी-खासी रकम खर्च करनी पड़ सकती है.

रीसेल वैल्यू भी बन सकती है चिंता

अगर पुरानी इलेक्ट्रिक कार बेचते हैं तो उसकी रीसेल वैल्यू काफी हद तक उसकी बैटरी पर निर्भर करती है. अगर बैटरी पुरानी हो गई है तो गाड़ी की रीसेल वैल्यू कम होती है.

दूसरी ओर फ्लेक्स फ्यूल कारों का इंजन नॉर्मल कारों जैसा होता है, इसलिए सेकेंड हैंड बाजार में इन्हें समझना और खरीदना लोगों के लिए आसान हो सकता है. लेकिन फ्यूल के हिसाब के देखें तो तकनीक नई है, और मार्केट पूरी तरह से समझने में समय लेगी. उसके बाद ही इनकी रीसेल वैल्यू को अच्छी तरह जाना जा सकता है.

 

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