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आस्था के नाम पर बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़...मध्यप्रदेश के इस गांव में बच्चा पैदा होने के बाद नदी में छोड़ने की है परंपरा

बैतूल में सालों से एक परंपरा चली आ रही है. यहां मन्नत पूरी होने पर नवजात को बच्चे को पालने में डाल कर छोड़ा जाता है. बच्चे को नदी का गंदा पानी भी पिलाया जाता है.

Betul traditon
gnttv.com
  • बैतूल,
  • 10 नवंबर 2022,
  • अपडेटेड 2:40 PM IST
  • प्रशासन ने साधी चुप्पी
  • पिलाते हैं गंदा पानी

मध्य प्रदेश के बैतूल में सालों से एक अनोखी परम्परा चली आ रही है. माता-पिता खुद अपने नवजात बच्चों को पालने में डाल कर नदी में छोड़ते हैं. मान्यता है कि संतानहीन दंपत्तियों को पूर्णा नदी में मन्नत करने पर संतान की प्राप्ति होती है. मन्नत पूरी होने पर नवजात बच्चों को पालने में डाल कर नदी में छोड़ा जाता है. यह परंपरा दुधमुंहे बच्चों के लिए खतरनाक भी हो सकती है पर आस्था के सामने इसका ध्यान नही रखा जाता.

बैतूल के भैसदेही से पूर्णा नदी का उदगम हुआ है. पूर्णा नदी को लेकर मान्यता है कि यहां पर मन्नत मांगने पर सभी की मन्नत पूर्ण होती है. खास तौर पर संतानहीन दंपत्तियों की खाली गोद भर जाती है. देश के कई स्थानों से संतान प्राप्ति की मन्नत लेकर यहां लोग आते हैं. मन्नत पूरी होने पर जब बच्चा पैदा होता है तो कार्तिक पूर्णिमा के बाद यहां पर अपने नवजात बच्चों को लाते हैं और पालने में डालकर पूजा करने के बाद उनका पालना नदी में तैराया जाता है. बच्चे रोते बिलखते हैं फिर भी आस्था के नाम पर परंपरा जारी है.

पिलाते हैं गंदा पानी
चन्द्रपुत्री पूर्णा नदी पर हर साल कार्तिक पूर्णिमा पर हर साल मेला लगता है. कार्तिक पूर्णिमा के बाद तीन दिन तक यहां पर नवजात बच्चों को पालना में डाल कर नदी में छोड़ा जाता है. बाकायदा तांत्रिक गाजेबाजे के साथ नाचते हुए नदी पर आते है और पूजा अर्चना करने के लाये गए पालने में बच्चे को उसमें लिटा कर नदी में छोड़ा जाता है. इस दौरान नदी का पानी भी जो पूजा सामग्री से गंदा हो जाता है उसे बच्चों को पिलाया जाता है. डॉक्टर इस तरह पानी को पिलाने को लेकर कहते है कि इससे बच्चे बीमार हो सकते हैं. 

क्या है कहानी?
तांत्रिक जो लोगो को संतान दिलाने की मन्नत करवाते है वे अपने को देवी का रूप बताते है. उनका कहना है की वे अम्बा देवी है और बच्चा दिलाने के लिए नृत्य करते है.दरअसल इस नदी के बारे में जानकारों का मानना है की ये चन्द्र पुत्री हैं और यहां के राजा के पास अठासी हजार ऋषि मुनि आये थे. उन्होंने ने राजा से दुग्ध के साथ आहार का दान मांगा था जिसको लेकर राजा ने भगवान शंकर की तपस्या की थी और उन्हें भगवान ने वरदान में गाय के रूप में पूर्णा दी थी और वे भैसदेही के काशी तालाब में छिप गई थी. उनका यही से उदगम हुआ है जैसा नाम है वैसा ही काम है जो भी आये उसकी मन्नत पूरी हो जाये.

प्रशासन ने साधी चुप्पी
नवजात बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले इस अंधविश्वास को लोग आस्था और परंपरा कहते हैं. परंपरा को लेकर प्रशासन भी मौन रहता है. जब खुद माता-पिता ही इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं तो उसे कौन रोक सकता है. हालांकि इस परंपरा को लेकर डॉक्टर बताते हैं कि इस तरह गंदा पानी बच्चों को पिलाना खतरनाक हो सकता है वह बीमार हो सकते हैं. पालना भी नदी में डूब सकता है जिससे नवजात बच्चों की जान पर बन सकती है.

 

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