अलग-अलग स्वाद में खाई जाती है देशभर में खिचड़ी, क्या है इसका इतिहास

मकर संक्रांति पर देश के कई हिस्सों में खिचड़ी खाने की परंपरा है. अलग-अलग जगहों पर खिचड़ी को अलग-अलग तरीके से बनाया जाता है. खिचड़ी का संबंध महाभारत काल से लेकर चंद्रगुप्त तक से बताया जाता है. मुगल काल में खिचड़ी को शाही दर्जा मिला. जहांगीर से लेकर औरंगजेब तक को खिचड़ी पसंद थी.

Khichadi
शशिकांत सिंह
  • नई दिल्ली,
  • 14 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 6:52 PM IST

मकर संक्रांति के मौके पर देश के कई हिस्सों में खिचड़ी खाने की परंपरा है. अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग स्वाद की खिचड़ी खाई जाती है. गुजरात से लेकर बंगाल तक, बिहार से लेकर महाराष्ट्र तक खिचड़ी का अलग-अलग रूप मिलता है. भारत के बाहर दक्षिण एशिया तक पर खिचड़ी का स्वाद मिल जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि खिचड़ी का इतिहास कितना पुराना है? खिचड़ी खाने की शुरुआत कब से हुई थी? चलिए आपको खिचड़ी का पूरा इतिहास बताते हैं.

क्या होती है खिचड़ी?
खिचड़ी में अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग चीजों का इस्तेमाल होता है. लेकिन मूल रूप से खिचड़ी का मतलब चावल और दाल का मिश्रण होता है. हालांकि इसमें अपने-अपने स्वाद के मुताबिक अरहर की दाल, मूंग की दाल का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें लौंग, जीरा, नमक डाला जाता है और इसे पकाया जाता है. खिचड़ी पोषकता से भरपूर होती है. खिचड़ी पेट के लिए फायदेमंद होती है.

खिचड़ी शब्द कहां से आया?
खिचड़ी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के खिच्चा से माना जाता है. इसका जिक्र महाभारत में भी हुआ है. वनवास के दौरान द्रौपदी ने पांडवों के लिए खिचड़ी बनाई थी. इसी खिचड़ी के एक दाने से भगवान कृष्ण ने ऋषि दुर्वासा की भूख शांत की थी. 

चंद्रगुप्त से जुड़ा खिचड़ी का इतिहास-
खिचड़ी का इतिहास हजारों साल पुराना है. सैकड़ों साल से खिचड़ी हमारी संस्कृति में है. मगध साम्राज्य के इतिहास में खिचड़ी का विशेष स्थान है. किस्सा है कि मगध में नंदवंश के आखिरी शासक घनानंद के खिलाफ युद्ध में चंद्रगुप्त को एक बार पीछे हटना पड़ा था. इस दौरान चंद्रगुप्त इधर-उधर भटक रहे थे. इसी दौरान एक बुजुर्ग महिला ने भोजन के तौर पर खिचड़ी बनाकर खिलाई थी. इस दौरान गर्म खिचड़ी से चंद्रगुप्त का हाथ जल गया था. इसपर बुजुर्ग महिला ने डांटकर कहा था कि खिचड़ी गर्म है, पहले किनारे से खाओ, उसके बाद बीच तक पहुंचना. इससे चाणक्य समझ गए कि पाटलिपुत्र पर आक्रमण नहीं करना है, बल्कि किनारों से जीतना है. इसके बाद युद्ध हुआ और चंद्रगुप्त की जीत हुई.

सेल्यूकस ने किया था खिचड़ी का जिक्र-
सिकंदर से सेनापति सेल्यूकस ने खिचड़ी का जिक्र किया था. 14वीं सदी में मोरक्को के मशहूर घुमंतू इब्नबतूता ने भी 'किशरी' नाम के एक भारतीय व्यंजन का जिक्र किया था. उसने किशरी को चावल, मूंग की दाल को पकाकर खाया जाने वाला व्यंजन बताया था.

औरंगजेब को कौन सी खिचड़ी थी पसंद?
मुगल बादशाह शाहजहां ने खिचड़ी को शाही दर्जा दिया. मुगल बादशाहों की शहंशाही दस्तरखान में खिचड़ी खूब लोकप्रिय हुई. मुगलों को कई तरह की खिचड़ी परोसी जाती थी. इसमें तेजा पत्ता, जावित्री लौंग, केसर, ड्राइ फ्रूट्स का इस्तेमाल किया जाता था. बाद में मुगलकाल में मांसाहारी खिचड़ी भी खाई जाती थी, जिसे हलीम कहा गया. जहांगीर को पिस्ता-किशमिश वाली खिचड़ी पसंद थी. औरंगजेब को मछली-अंडे वाली आलमगीरी खिचड़ी पसंद थी. अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को भी खिचड़ी खूब पसंद थी.

प्रसाद के तौर पर भी मिलती है खिचड़ी-
बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान खिचड़ी का प्रसाद बांटा जाता है. इसे खिचुरी कहा जाता है. जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ को 56 भोग परोसे जाते हैं. इसमें खेचुड़ी थाल सबसे अहम होती है. इसमें उरद और मूंग के दाल में चावलों को पकाया जाता है.

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