अपने खास तरीकों से स्पेशल बच्चों की जिंदगी बदल रहे राजीव…राष्ट्रपति पुरस्कार से हुए सम्मानित

इस सफर की शुरुआत 1994 में हुई. पॉकेट मनी के लिए वे एक बच्चे को ट्यूशन पढ़ा रहे थे. बच्चा बार-बार अक्षर लिखने और पहचानने में गलती कर रहा था. पहले लगा कि बच्चा पढ़ाई में कमजोर है, लेकिन बाद में डॉक्टर से जांच कराई गई तो पता चला कि उसे डिस्लेक्सिया है.

President Award
मनीष चौरसिया
  • नई दिल्ली,
  • 13 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:48 PM IST

दिल्ली के राजीव भट्ट पिछले तीन दशकों से डिस्लेक्सिया, ऑटिज्म और डाउन सिंड्रोम से जुड़े बच्चों के लिए काम कर रहे हैं. उनका मानना है कि स्पेशल बच्चे अलग जरूर होते हैं, लेकिन कमतर बिल्कुल नहीं. राजीव ‘अध्ययन’ नाम से एक सेंटर चलाते हैं. यहां स्पेशल बच्चों के लिए खास एजुकेशनल प्रोग्राम और थेरेपी डिजाइन की गई हैं. पढ़ाई के साथ-साथ बिहेवियर, कम्युनिकेशन और स्किल डेवलपमेंट पर काम किया जाता है.

21 साल के नमित गोयल को ऑटिज्म है. आज नमित न सिर्फ अपनी मम्मी से खुलकर बात करता है, बल्कि यह भी बता पाता है कि उसे आगे बिजनेस करना है और उसके लिए उसे क्या-क्या सीखना होगा.

नमित की मां सविता गोयल बताती हैं कि एक वक्त था जब नमित इतना कॉन्फिडेंट और मिलनसार नहीं था लेकिन सही गाइडेंस और थेरेपी ने उसकी जिंदगी काफी बदल दी.

अलग हैं, कमजोर नहीं
राजीव भट्ट कहते हैं कि स्पेशल बच्चे कई बार नॉर्मल बच्चों जैसे नहीं दिखते. उनका बोलने, समझने और व्यवहार करने का तरीका अलग हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे बौद्धिक रूप से कमजोर हैं. इसी सोच को बदलने की लड़ाई राजीव लंबे समय से लड़ रहे हैं.

1994 में शुरू हुई ये सोच
राजीव बताते हैं कि इस सफर की शुरुआत 1994 में हुई. पॉकेट मनी के लिए वे एक बच्चे को ट्यूशन पढ़ा रहे थे. बच्चा बार-बार अक्षर लिखने और पहचानने में गलती कर रहा था. पहले लगा कि बच्चा पढ़ाई में कमजोर है, लेकिन बाद में डॉक्टर से जांच कराई गई तो पता चला कि उसे डिस्लेक्सिया है.

राजीव कहते हैं, मुझे एक बच्चे की दिक्कत समझने में ही इतना वक्त लग गया, तो समाज को समझने में कितना वक्त लगता होगा. यहीं से उन्होंने स्पेशल बच्चों के लिए काम करने का फैसला कर लिया.

14 साल की नवंशिता का बिहेवियर पहले काफी आक्रामक था. राजीव और उनकी टीम ने उसके गुस्से को पहचानकर उसे डांस की तरफ मोड़ा. आज नवंशिता एक अच्छी डांसर है और उसका बिहेवियर भी पहले से काफी बेहतर है. ऐसे ही कई केस स्टडी हैं, जहां बच्चों में पॉजिटिव बदलाव देखने को मिला.

पढ़ाई से नौकरी तक का सफर
राजीव सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं हैं. वे स्कूलों और कंपनियों से बात करते हैं कि नॉर्मल लोगों के साथ स्पेशल बच्चों को भी मौका दिया जाए. उनकी आवाज असम, यूपी, उत्तराखंड, राजस्थान समेत देश के 10 राज्यों तक पहुंच चुकी है. इसका नतीजा ये है कि आज उनके कई बच्चे देश के बड़े रेस्टोरेंट और कैफे में काम कर रहे हैं.

राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मान
स्पेशल बच्चों के लिए किए गए इस अभूतपूर्व काम के लिए राजीव भट्ट को पिछले साल दिसंबर में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. राजीव की कोशिशें लगातार रंग तो ला रही हैं. लेकिन एक समाज के रूप में अभी ही ऐसे बच्चों को लेकर और जागरूकता आनी बाकी है. हालांकि राजीव को विश्वास है कि इस तरफ लोगों की सोच पॉजिटिव तरीके से बहुत तेजी से बदल रही है.

 

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