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न प्लास्टिक, न कृत्रिम सजावट... हिमालय की वनस्पतियों से मुखवा में तैयार हो रही इको-फ्रेंडली राखियां

मुखवा गांव धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से खास महत्व रखता है. यह मां गंगा का शीतकालीन पूजा स्थल है. सर्दियों में जब गंगोत्री धाम के कपाट बंद रहते हैं, तब मां गंगा की पूजा-अर्चना मुखवा में ही की जाती है.

Sustainable Rakhis
gnttv.com
  • उत्तरकाशी,
  • 24 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 10:25 AM IST

मां गंगा के शीतकालीन प्रवास स्थल मुखवा गांव में इन दिनों रक्षाबंधन को लेकर एक अनोखी पहल देखने को मिल रही है. गांव की ग्रामीण महिलाएं हिमालयी क्षेत्र में मिलने वाली प्राकृतिक और धार्मिक महत्व वाली वनस्पतियों से पारंपरिक राखियां तैयार कर रही हैं. इन राखियों में भोजपत्र, देवदार की पत्ती, केदारपाती, पदम की लकड़ी और ब्रह्मकमल जैसी प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है. महिलाओं की यह पहल भाई-बहन के रिश्ते के इस पर्व को हिमालयी संस्कृति और प्रकृति संरक्षण से जोड़ रही है.

प्राकृतिक चीजों को सहेजकर दे रहीं राखी का रूप
मुखवा गांव की महिलाएं पूरे मनोयोग से हिमालयी क्षेत्र में मिलने वाली प्राकृतिक सामग्रियों को सहेजकर उन्हें राखी का सुंदर रूप दे रही हैं. इन राखियों को आकर्षक और पारंपरिक तरीके से तैयार किया जा रहा है. इन्हें बाजार में उतारने की भी तैयारी है. महिलाएं रक्षाबंधन के दिन इन्हीं प्राकृतिक राखियों को अपने भाइयों की कलाई पर बांधकर स्थानीय संस्कृति और प्रकृति को बचाने का संदेश भी देंगी. उनका प्रयास है कि बाजार में मिलने वाली प्लास्टिक और कृत्रिम सामग्री से बनी राखियों के बीच प्राकृतिक राखियों को भी जगह मिले.

मां गंगा के शीतकालीन पूजा स्थल से जुड़ी है पहल
मुखवा गांव धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से खास महत्व रखता है. यह मां गंगा का शीतकालीन पूजा स्थल है. सर्दियों में जब गंगोत्री धाम के कपाट बंद रहते हैं, तब मां गंगा की पूजा-अर्चना मुखवा में ही की जाती है. ऐसे में यहां तैयार हो रही राखियों में स्थानीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं की झलक भी दिखाई देती है.

ब्रह्मकमल समेत कई वनस्पतियों का इस्तेमाल
पर्वतीय समाज में केदारपाती, पदम की लकड़ी और ब्रह्मकमल जैसी प्राकृतिक वनस्पतियों को लेकर कई लोकमान्यताएं जुड़ी हुई हैं. ब्रह्मकमल उत्तराखंड का राज्य पुष्प है. गंगोत्री घाटी समेत हिमालयी क्षेत्रों में इसे देवी-देवताओं को अर्पित करने की परंपरा रही है. स्थानीय मान्यता के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान के बाद ब्रह्मकमल को घर के देवालय या पूजा स्थल में रखना सुख-समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है. यही वजह है कि इन प्राकृतिक सामग्रियों से बनी राखियों में स्थानीय लोगों को अपनी संस्कृति और आस्था की झलक भी नजर आती है.

पहले भी हो चुकी है ऐसी पहल
उत्तराखंड में इससे पहले भी स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं ने ब्रह्मकमल, केदारपाती और दूसरी स्थानीय प्राकृतिक सामग्रियों से पर्यावरण हितैषी राखियां तैयार की हैं. लोगों ने इस पहल को काफी पसंद किया था. मुखवा की महिलाएं भी इसी सोच को आगे बढ़ा रही हैं. ग्रामीण महिलाओं की यह पहल सिर्फ राखियां बनाने और उन्हें बेचने तक सीमित नहीं है. इसके जरिए महिलाएं स्वरोजगार का रास्ता भी तलाश रही हैं. साथ ही हिमालयी लोकसंस्कृति, पारंपरिक मान्यताओं और प्रकृति से जुड़ी जानकारी को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं.

--ओंकार बहुगुणा

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