हिंदू पंचांग में 12 मास होते हैं. यह सूर्य की संक्रांति और चंद्रमा पर आधारित होते हैं. हर वर्ष सूर्य और चंद्र मास में लगभग 11 दिनों का अंतर आ जाता है. 3 वर्ष में यह अंतर लगभग एक माह का हो जाता है, इसलिए हर तीसरे वर्ष अधिक मास आ जाता है. इसको लोकाचार में मलमास भी कहा जाता है. इस बार ज्येष्ठ में अधिक मास रहेगा. यह 17 मई से 15 जून 2026 तक रहेगा.
क्या है अधिक मास का महत्व?
अधिक मास को पहले बहुत अशुभ माना जाता था. बाद में श्रीहरि ने इस मास को अपना नाम दे दिया. तबसे अधिक मास का नाम पुरुषोत्तम मास हो गया. इस मास में भगवान विष्णु के सारे गुण पाए जाते हैं. इस मास में धर्म कार्यों के उत्तम परिणाम मिलते हैं. अधिकमास में मंत्र जाप और व्रत रखना बहुत लाभदायक होता है. 'ऊं नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का रोज जाप करें, अगर संभव हो तो तुलसी की माला से 108 बार जप करें. व्रत रखने से मन और इंद्रियों पर नियंत्रण आता है और ध्यान भगवान में लगता है.
अधिक मास में कौन-कौन से कार्य न करें?
यह महीना आध्यात्मिक महीना है. इस महीने भौतिक जीवन से संबंधित कार्य करने की मनाही है. विवाह, कर्णवेध, चूड़ाकरण आदि मांगलिक कार्य वर्जित हैं. गृह निर्माण और गृह प्रवेश भी वर्जित है. हालांकि जो कार्य पूर्व निश्चित हैं, वे कार्य किए जा सकते हैं.
अधिक मास में कौन-कौन से कार्य करना है लाभदायक?
नियमित रूप से श्री हरि, अपने गुरु या इष्ट की आराधना करें. जहां तक संभव हो आहार, विचार और व्यवहार सात्विक रखें. पूरे माह में श्रीमद्भागवत या भगवद गीता का पाठ करें. इससे ज्ञान बढ़ता है और जीवन को सही दिशा मिलती है. सिर्फ पढ़ें ही नहीं, बल्कि उसकी बातों को अपने जीवन में उतारने की कोशिश करें.निर्धनों की सहायता करें. अन्न, वस्त्र और जल का दान करें. इस माह में पूर्वजों और पितरों के लिए किए गए कार्य भी लाभदायक होते हैं. लौकिक कामनाओं के लिए इस महीने किए गए प्रयोग अवश्य सफल होते हैं.
कैसे अधिक मास में ग्रहों को अनुकूल बनाएं और ईश्वर की कृपा प्राप्त करें?
पूरे महीने, प्रातः और सायंकाल भगवान कृष्ण की उपासना करें. संध्याकाल को उनके समक्ष दीपक जरूर जलाएं. नियमित रूप से भगवान की कथा का श्रवण करें. निर्धनों को जल और ऋतुफल का दान करें. माह के अंत में तीस की संख्या में मिठाई का दान करें. अधिक मास परम पवित्र मास है. इस समय दान और उपासना के अत्यधिक शुभ फल प्राप्त होते हैं.