महाराष्ट्र के अमरावती में गणेश उत्सव के दौरान गणपति बप्पा की भक्ति में पर्यावरण संरक्षण का संदेश अनोखे अंदाज में देखने को मिला. बडनेरा के जय हिंद गणेश उत्सव मंडल ने अंजीर और मखाने से 7 फीट ऊंची गणपति प्रतिमा तैयार की है, तो विलास नगर के गणेश उत्सव मंडल ने सुपारी और पूजा सामग्री से नवग्रह की अनोखी प्रतिमा बनाई है.
खास बात यह है कि ये सिर्फ इस साल का प्रयोग नहीं है. दोनों ही गणेश मंडल पिछले कई वर्षों से इको-फ्रेंडली सामग्री से गणपति बप्पा की प्रतिमा बनाने की परंपरा निभा रहे हैं.
अंजीर-मखाने से तैयार गणेश प्रतिमा-
अमरावती के बडनेरा इलाके में जय हिंद गणेश उत्सव मंडल का यह गणपति पंडाल इन दिनों खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. यहां इस बार करीब 7 फीट ऊंची गणपति प्रतिमा अंजीर और मखाने से तैयार की गई है. प्रतिमा बनाने में करीब 31 किलो अंजीर और 2 किलो मखाने का इस्तेमाल किया गया है.
इको-फ्रेंडली गणपति की परंपरा-
जय हिंद गणेश उत्सव मंडल पिछले कई वर्षों से इको-फ्रेंडली गणपति प्रतिमा बनाने का प्रयास करता आ रहा है. हर साल प्राकृतिक और पर्यावरण अनुकूल सामग्री का इस्तेमाल कर बप्पा की प्रतिमा तैयार की जाती है. इसके पीछे मंडल का उद्देश्य श्रद्धालुओं के बीच पर्यावरण संरक्षण का संदेश पहुंचाना है.
विलास नगर में नवग्रह का स्वरूप बनाया गया-
कुछ ऐसा ही अनोखा प्रयोग अमरावती के विलास नगर इलाके में भी देखने को मिल रहा है. यहां गणेश उत्सव मंडल ने पूजा में इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक सामग्री से नवग्रह का सुंदर स्वरूप तैयार किया है. इसमें करीब 21 किलो लाल सुपारी के साथ हल्दी, इलायची, लौंग, खड़ी हल्दी और नवग्रह पूजा में इस्तेमाल होने वाली अन्य सामग्री का इस्तेमाल किया गया है.
यह मंडल भी पिछले कई वर्षों से पर्यावरणपूरक गणपति उत्सव मनाने और प्राकृतिक सामग्री से प्रतिमाएं तैयार करने की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है.
पर्यावरण संरक्षण का संदेश- पंडाल अध्यक्ष
अमरावती में बाल सहयोग गणेश पंडाल अध्यक्ष स्वप्निल बावरिया ने कहा कि अमरावती में गणपति बप्पा की भक्ति का यह अंदाज अपने आप में खास है. इन दोनों मंडलों ने पिछले कई वर्षों से इको-फ्रेंडली प्रतिमाएं बनाने की परंपरा कायम रखी है. इस बार कहीं अंजीर और मखाने से बप्पा का स्वरूप तैयार किया गया है, तो कहीं सुपारी और पूजा सामग्री से नवग्रह की प्रतिमा. यानी आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है.
भक्ति ऐसी कि पर्यावरण को नुकसान न हो- कार्यकर्ता
मंडल के कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्लास्टर ऑफ पेरिस जैसी सामग्री से बनी प्रतिमाओं के विसर्जन के बाद पर्यावरण को नुकसान पहुंचने की चिंता रहती है. इसीलिए दोनों मंडलों ने पिछले कई वर्षों से प्राकृतिक और पर्यावरण अनुकूल सामग्री का इस्तेमाल करने का रास्ता चुना है. इनका मानना है कि बप्पा की भक्ति ऐसी हो, जिससे प्रकृति को नुकसान न पहुंचे.
अमरावती में इन अनोखी प्रतिमाओं को देखने के लिए श्रद्धालु भी बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं. किसी के लिए यह बप्पा की अनोखी प्रतिमा है, तो किसी के लिए पर्यावरण बचाने का संदेश. भक्ति वही, आस्था वही... लेकिन बप्पा का स्वरूप ऐसा, जो प्रकृति के करीब हो. गणपति उत्सव के जरिए अमरावती के इन दोनों मंडलों की यह पहल श्रद्धालुओं को यही संदेश दे रही है.
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