सनातन धर्म में माघ मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का विशेष महत्व है. हर साल इस दिन भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) मनाई जाती है. महाभारत सहित कई हिंदू धर्मग्रंथों में लिखा हुआ है कि शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन ही भीष्म पितामह ने बाणों की शैय्या के ऊपर अपने प्राण त्याग किए थे. ऐसी मान्यता है कि भीष्म अष्टमी के दिन पितरों का तर्पण करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है. पितरों का तर्पण करने वाले व्यक्ति को पितृ दोष से मुक्ति मिलती है.
कब है भीष्म अष्टमी
हिंदू पंचांग के मुताबिक इस साल माघ महीने की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 25 जनवरी को रात 11:10 बजे होगी और इसका समापन 26 जनवरी 2026 को रात 9:11 बजे होगा. उदयातिथि को मुताबिक भीष्म अष्टमी का व्रत 26 जनवरी दिन सोमवार को रखा जाएगा. 26 जनवरी 2026 को पूजा के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 11:29 बजे से लेकर दोपहर 1:38 बजे तक रहेगा. यह समय पितरों के श्राद्ध कर्म के लिए उत्तम रहेगा.
बाणों की शैय्या पर लेटे रहे भीष्म पितामह
भीष्म अष्टमी देवव्रत यानी भीष्म पितामह की पुण्यतिथि के रूप में मनाई जाती है. इसी दिन भीष्म पितमाहन ने अपने प्राणों का त्याग किया था. पौराणिक कथा के मुताबिक भीष्म पितामह को अपने पिता शांतनु से इच्छा मृत्यु का वरदान मिला हुआ था, इसलिए वो अपनी मर्जी से ही अपने प्राणों का त्याग कर सकते थे.
श्रीमद्भगवद्गीता में बताया गया है कि महाभारत के युद्ध में अर्जुन के तीरों से घायल होकर भी भीष्म पितामह 18 दिनों तक बाणों की शैय्या पर लेटे रहे. बाणों की शैय्या पर लेटकर महाभारत का युद्ध देखा था. भीष्म पितामह ने अपने प्राण त्याग करने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की और माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन अपने प्राण त्यागे. ऐसी धार्मिक मान्यता है कि सूर्य के उत्तरायण के समय में देह का त्याग होने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है. ऐसी मान्यता है कि भीष्म अष्टमी के दिन पितरों का तर्पण और उनके नाम से दान करने पर व्यक्ति को पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है. पितरों की आत्मा को शांति प्राप्त होती है. पितृ दोष से छुटकारा मिलता है. इस दिन पितरों का तर्पण और श्राद्ध कर्म करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.
भीष्म अष्टमी के दिन ऐसे करें पूजा
1. भीष्म अष्टमी के दिन किसी पवित्र नदी में स्नान करें.
2. इसके बाद व्रत करने का संकल्प लें.
3. फिर बिना सिले वस्त्र धारण करें. जनेऊ धारण करें.
4. दाहिने कंधें पर गमछा रखें और हाथ में तिल और जल लें.
5. फिर हाथ में तिल और जल लेकर दक्षिण की ओर मुख करें.
6. इसके बाद वैयाघ्रपदगोत्राय सांकृतिप्रवराय च. गंगापुत्राय भीष्माय, प्रदास्येहं तिलोदकम् अपुत्राय ददाम्येतत्सलिलं भीष्मवर्मणे मंत्र का जाप करें.
7. फिर तिल और जल अंगूठे और तर्जनी उंगली के मध्य भाग से होते हुए पात्र में छोड़ें.
8. अब जनेऊ या गमछे को बाएं कंधे पर डाल लें और गंगापुत्र भीष्म को अर्घ्य दें.
9. भीष्म अष्टमी पर पितरों की शांति के लिए तर्पण और श्राद्ध आदि जरूर करना चाहिए.
10. इस दिन पर तिल, अन्न और सफेद वस्त्रों के दान करना चाहिए.
11. गाय को हरा चारा और हरी सब्जियां खिलानी चाहिए.