चैत्र नवरात्रि का छठा दिन देवी मां कात्यायनी को समर्पित होता है. इस दिन श्रद्धालु पूरी आस्था के साथ मां की पूजा-अर्चना करते हैं और उनसे सुख, समृद्धि तथा मनोवांछित फल की कामना करते हैं. मान्यता है कि मां कात्यायनी की आराधना करने से न केवल साहस और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त होता है. विशेष रूप से अविवाहित कन्याएं योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए इस दिन व्रत और पूजा करती हैं.
पूजा का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कात्यायनी की पूजा का विशेष महत्व है. कहा जाता है कि प्राचीन काल में गोपियों और राधा जी ने भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए मां कात्यायनी की आराधना की थी. उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां ने उन्हें आशीर्वाद दिया था. इस प्रकार, नवरात्रि का छठा दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ मां कात्यायनी की पूजा करने का विशेष अवसर होता है, जो जीवन में सुख, शांति और सफलता का मार्ग खोलता है.
मां कात्यायनी की पूजा विधि
नवरात्रि के छठे दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना शुभ माना जाता है. इसके बाद साफ-सुथरे, विशेष रूप से लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करें. पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर लें और विधिपूर्वक कलश की स्थापना करें. इसके बाद मां कात्यायनी को वस्त्र अर्पित करें और घी का दीपक जलाएं. मां को रोली लगाकर ताजे फूल अर्पित करें. भोग के रूप में पान के पत्ते पर सुपारी और बताशे में लौंग रखकर अर्पित करें. अंत में कपूर जलाकर मां की आरती करें और उनसे सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें.
मां कात्यायनी का स्वरूप
मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत दिव्य और तेजस्वी माना जाता है. उनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला है. मां की चार भुजाएं हैं और वे सिंह पर सवार रहती हैं. उनके एक हाथ में तलवार होती है, जबकि दूसरे में कमल का फूल. शेष दो हाथों से वे भक्तों को आशीर्वाद और वरदान प्रदान करती हैं. उनका यह रूप शक्ति, साहस और संरक्षण का प्रतीक है.
प्रिय भोग और उसका महत्व
मां कात्यायनी को पीले रंग की मिठाइयां अत्यंत प्रिय हैं. इस दिन विशेष रूप से बेसन का हलवा अर्पित किया जाता है. इसके अलावा पीली बर्फी या अन्य पीले रंग के मिष्ठान भी चढ़ाए जा सकते हैं. मान्यता है कि इस प्रकार का भोग लगाने से मां प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं.
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