धनतेरस का नाम सुनते ही सबसे पहले सोना, चांदी, बर्तन और नई चीजें खरीदने का ख्याल आता है. इस दिन लोग माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा करते हैं. मान्यता है कि धनतेरस पर नई चीजें खरीदने से घर में सुख-समृद्धि आती है.
लेकिन क्या आप जानते हैं कि राजस्थान में धनतेरस मनाने की एक ऐसी परंपरा भी है, जिसमें सोने-चांदी से ज्यादा मिट्टी को महत्व दिया जाता है. यह परंपरा करीब 100 साल से भी ज्यादा पुरानी मानी जाती है.
पीली और लाल मिट्टी को माना जाता है शुभ
राजस्थान के जोधपुर, उदयपुर और मारवाड़ के कई इलाकों में धनतेरस पर पीली और लाल मिट्टी की पूजा करने की परंपरा है. यहां मिट्टी को केवल जमीन या धूल नहीं माना जाता, बल्कि इसे जीवन और खुशहाली का आधार समझा जाता है.
मान्यताओं के अनुसार, पीली और लाल मिट्टी में माता लक्ष्मी का वास होता है. धरती हमें अनाज, पानी और रहने के लिए जगह देती है. इसलिए धनतेरस के दिन मिट्टी की पूजा करके धरती माता से सुख-शांति और खुशहाली की कामना की जाती है.
आंगन और घर की चौखट को मिट्टी से लीपने की परंपरा
पुराने समय में घरों के आंगन, दीवारों और दरवाजों की चौखट को गोबर और मिट्टी से लीपा जाता था. राजस्थान के कई परिवार आज भी धनतेरस पर इस परंपरा को निभाते हैं.
माना जाता है कि मिट्टी से आंगन और चौखट को लीपने से घर पवित्र होता है और नकारात्मकता दूर रहती है. दिवाली से पहले घर की साफ-सफाई करना भी इसी परंपरा का हिस्सा है. मान्यता है कि साफ और सुंदर घर में माता लक्ष्मी का आगमन होता है.
कैसे की जाती है मिट्टी की पूजा?
इस परंपरा में घर की सुहागिन महिलाएं धनतेरस की सुबह सूर्योदय से पहले उठकर पारंपरिक कपड़े पहनती हैं. इसके बाद वे जल, कुमकुम, चावल, दीपक और धान लेकर मिट्टी वाली जगह पर जाती हैं.
वहां सबसे पहले जमीन पर स्वास्तिक बनाया जाता है. इसके बाद पीली और लाल मिट्टी की पूजा की जाती है. महिलाएं धरती माता से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनाए रखने की प्रार्थना करती हैं.
पूजा के बाद मिट्टी को एक बर्तन या कलश में रखकर सिर पर उठाया जाता है. महिलाएं गीत गाते हुए इसे घर लेकर आती हैं. फिर इसी मिट्टी से घर के आंगन और चौखट को लीपा जाता है.