Lord Krishna Birth at 12 AM: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पूरे देश में 4 सितंबर 2026 को धूमधाम से मनाई जा रही है. घरों और मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की तैयारियां और पूजा-अर्चना जारी है. भगवान श्रीकृष्ण के भक्त व्रत रखकर आधी रात को कान्हा के जन्म का इंतजार कर रहे हैं. रात 12 बजे शंख-घंटियों की गूंज के बीच भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाएगा. आइए जानते हैं क्या सच में कान्हा का जन्म ठीक रात 12 बजे ही हुआ था, आखिर क्या है इसको लेकर धार्मिक ग्रंथों में मान्यताएं?
कारागार में हुआ था कान्हा का जन्म
हिंदू पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में आधी रात को हुआ था. ऐसे में हर साल इस तिथि और नक्षत्र में 12 बजे रात में जन्माष्टमी मनाई जाती है. आपको मालूम हो कि कान्हा का जन्म मथुरा में उनके मामा कंस की कारागार (जेल) में हुआ था. कान्हा की मां देवकी और पिता वसुदेव थे. कंस की बहन देवकी थीं. कंस ने देवकी के आठवें पुत्र द्वारा अपनी मृत्यु की भविष्यवाणी सुनी थी, और इसी डर से उसने देवकी और वसुदेव को कारागार (जेल) में डाल रखा था.
आधी रात को ही क्यों हुआ कान्हा का जन्म
आधी रात को ही क्यों कान्हा का जन्म हुआ था. दरअसल, आधी रात का समय गहन अंधकार और अज्ञान का प्रतीक है. ऐसे समय में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म यह दिखाता है कि जब बुराई और अन्याय चरम पर होती है, तब वे स्वयं उस अंधकार को दूर करने के लिए आते हैं और धर्म और सत्य की स्थापना करते हैं. आधी रात को कान्हा का जन्म अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है.
मुरलीधर के रात 12 बजे जन्म को लेकर ये भी कहा जाता है
आपको मालूम हो कि हिंदू पंचांग में रात के 12 बजे को संधि काल या निशिता काल कहा जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस समय की ऊर्जा विशेष होती है. इस समय को साधना, ध्यान और आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए विशेष माना गया है. ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण के मध्यरात्रि में अवतार लेने को भी इसी आध्यात्मिक महत्व से जोड़कर देखा जाता है. अष्टमी तिथि भी एक तरह से संधि तिथि मानी गई है. सात तिथि आगे और सात तिथि पीछे. ऐसे में अष्टमी की रात 12 बजे उच्चतम ऊर्जा का प्रवाह होता है. आधी रात को जन्म लेने का मतलब ये है कि भगवान श्रीकृष्ण अज्ञान रूपी अंधकार से भरी दुनिया में ज्ञान और भक्ति का मार्ग दिखाने के लिए आधी रात को जन्म थे.
...तो भगवान का जन्म गुप्त तरीके से होना जरूरी था
कंस माता देवकी और पिता वसुदेव के आठवें पुत्र को मारना चाहता था. कंस की वजह से भगवान श्रीकृष्ण का जन्म गुप्त तरीके से होना जरूरी था. रात 12 बजे का समय इस गोपनीयता के लिए सबसे सही था. इस समय सभी सैनिक और रक्षक सो रहे थे, जिससे वसुदेव जी को उन्हें सुरक्षित रूप से गोकुल तक पहुंचाने का समय मिल सका. ब्रज के रसिक जन जो नट नटेश्वर को एक सखा और मित्र के रूप में देखते हैं, वो कहते हैं कि चोर तो रात में ही आते हैं. भगवान श्रीकृष्ण तो कंस से नजर बचाकर चोरी छिपे ही आए. माखन चोर भी कहलाए. इसे लेकर प्रसिद्ध श्लोक व्रजे प्रसिद्धं नवनीतचौरं गोपाङ्गनानां च दुकूलचौरम्, अनेकजन्मार्जितपापचौरं चौराग्रगण्यं पुरुषं नमामि है.
पहले से ही तय था भगवान श्रीकृष्ण का जन्म
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म पहले से ही तय था. भगवान कृष्ण सिर्फ कंस का वध करने ही नहीं बल्कि पृथ्वी पर धर्म की स्थापना करने और अपने भक्तों को मुक्ति दिलाने के लिए अवतरित हुए थे. इस वजह से कन्हैया का जन्म आधी रात के रहस्यमय माहौल में हुआ.
आज तक कायम है यह परंपरा
आपको मालूम हो कि प्राचीन धर्म शास्त्रों में आज की तरह घड़ी के हिसाब से 12:00 AM लिखकर समय नहीं बताया जाता था. भगवान श्रीकृष्ण जन्म का वर्णन मध्यरात्रि और निशिता काल जैसे समय खंडों के आधार पर किया गया है. बाद के समय में इसी मध्यरात्रि को आम बोलचाल में रात के 12 बजे के रूप में समझा जाने लगा. जन्माष्टमी पर इसी वजह से रात 12 बजे भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव मनाने की परंपरा शुरू हो गई जो आज तक कायम है.
...तो सभी बाधाएं अपने आप हो जाती हैं दूर
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय कई अलौकिक घटनाएं घटीं थीं. भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय यमुना नदी पूरे उफान पर थीं. अर्ध रात्रि होने से सारे पहरेदार भी ऊंघ रहे थे. कारागार के सभी दरवाजे अपने आप ही खुल गए थे और प्रभु श्रीकृष्ण दिव्य स्वरूप में प्रकट हुए थे. देवी यमुना ने वसुदेव जी को जाने के लिए खुद रास्ता दिया था. ये सभी घटनाएं दिखाती हैं कि जब भगवान स्वयं अवतरित होते हैं तो सभी बाधाएं अपने आप दूर हो जाती हैं.