मां चिंतापूर्णी शक्तिपीठ में श्रद्धालुओं की होती हैं सभी चिंताएं दूर, चैत्र नवरात्र के लिए दुल्हन की तरह सजा मंदिर

हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ माँ चिंतापूर्णी (छिन्नमस्तिका धाम) चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर श्रद्धालुओं के स्वागत के लिए पूरी तरह तैयार है. 19 से 27 मार्च तक चलने वाले इस मेले के लिए प्रशासन ने सुरक्षा और शांति व्यवस्था बनाए रखने हेतु कड़े नियम लागू किए हैं.

Una Chinnamastika Shaktipeeth
gnttv.com
  • ऊना,
  • 18 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 6:13 PM IST

मां चिंतापूर्णी का दरबार एक ऐसा पवित्र स्थान है, जहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होने की मान्यता है. कहा जाता है कि यहां आने वाले भक्तों की चिंताएं दूर हो जाती हैं, इसलिए इन्हें मां चिंतापूर्णी कहा जाता है. वास्तव में माता का नाम मां छिन्नमस्तिका है, लेकिन भक्तों की चिंताओं को हरने के कारण यह धाम चिंतापूर्णी के नाम से प्रसिद्ध हो गया. यह स्थान हिंदू धर्म के 52 शक्तिपीठों में से एक है, जिस वजह से इसका विशेष धार्मिक महत्व है.

हिमाचल के ऊना में स्थित है पवित्र धाम
मां चिंतापूर्णी मंदिर हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है. यहां साल भर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन नवरात्र के दौरान यह स्थान भक्ति और आस्था का विशाल केंद्र बन जाता है. चैत्र नवरात्र के अवसर पर मंदिर को विशेष रूप से सजाया गया है और रोजाना हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर मां के चरणों में शीश झुकाते हैं.

पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, भक्त माई दास को मां चिंतापूर्णी ने कंजक रूप में दर्शन दिए थे और उन्हें इसी स्थान पर तपस्या करने के लिए कहा था. बाद में वही कंजक इस स्थान पर पिंडी रूप में स्थापित हो गईं. पहले इस स्थान को छिन्नमस्तिका धाम के नाम से जाना जाता था, लेकिन समय के साथ भक्तों ने इसे मां चिंतापूर्णी के रूप में स्वीकार कर लिया. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजा करने पर मां हर मनोकामना पूरी करती हैं.

शक्ति पीठ की उत्पत्ति की कथा
धर्मग्रंथों के अनुसार, जब आदि शक्ति मां जगदंबा (मां पार्वती) ने अपनी योगाग्नि में स्वयं को समर्पित किया, तब उनके अंग जहां-जहां गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए.

एक अन्य कथा के अनुसार, देव-दानव युद्ध के दौरान रक्तबीज नामक राक्षस का संहार करने के लिए मां ने अपनी योगिनियों जया और विजया को आदेश दिया कि वह उसका रक्त धरती पर गिरने से पहले ही पी लें. जब उनकी रक्त पिपासा शांत नहीं हुई, तो मां भगवती ने स्वयं अपनी गर्दन धड़ से अलग कर दी. इसके बाद उनके गले से रक्त की तीन धार निकली. पहली दो धार उन्होंने जया और विजया को पिलाया और तीसरा धार खुद उनके मुंह में गया. इसी कारण माता छिन्नमस्तिका के नाम से विख्यात हुईं.

नवरात्र मेले में विशेष आस्था
चैत्र नवरात्र के दौरान यहां विशेष मेला लगता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं. भक्त मां की पिंडी के दर्शन करने के बाद कंजक पूजन भी करते हैं. मान्यता है कि अगर श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजा की जाए, तो मां अपने भक्तों की हर इच्छा पूरी करती हैं.

ये हैं मेला के नियम
नवरात्र मेले के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए 19 से 27 मार्च तक विशेष नियम लागू किए गए हैं. ड्यूटी पर तैनात जवानों को छोड़कर किसी भी व्यक्ति के किसी भी तरह के हथियार लेकर चलने पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा. ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए मंदिर न्यास के अलावा किसी को लाउडस्पीकर इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होगी. मेले में ब्रास बैंड, ड्रम और लंबे चिमटे लाने पर भी रोक लगाई गई है. इन वस्तुओं को पुलिस द्वारा बनाए गए बैरियर पर जमा करवाना होगा. पॉलीथीन के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा. खुले में या सड़क किनारे लंगर लगाने की अनुमति नहीं होगी. आतिशबाजी पर भी रोक लगाई गई है.

मां चिंतापूर्णी धाम में आस्था के साथ-साथ व्यवस्था का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है, ताकि श्रद्धालु सुरक्षित और शांत वातावरण में पूजा कर सकें. नवरात्र के इस पावन अवसर पर यह धाम एक बार फिर भक्ति, विश्वास और अनुशासन का अद्भुत उदाहरण बनकर सामने आ रहा है.


(रिपोर्ट- संदीप खडवाल)

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