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बच्चे को संस्कारी कैसे बनाएं? जानें क्या सिखाएं 5 साल तक... किन चीज़ों से रखें दूर 21 साल तक

हर कोई चाहता है कि उनका बच्चा संस्कारी बने. लेकिन बच्चे को संस्कारी बने के लिए पहले खुद भी अच्छा व्यवहार रखना होता है. साथ ही बढ़ती उम्र के साथ उसे अलग-अलग तरीकों से संस्कार देने चाहिए.

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gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 21 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 8:36 PM IST

बच्चे का व्यवहार और उसकी आदतें बचपन से ही बननी शुरू हो जाती हैं. घर का माहौल, माता-पिता का व्यवहार, खान-पान, दोस्तों की संगति और रोजमर्रा की आदतें बच्चे के व्यक्तित्व पर गहरा असर डालती हैं. माना जाता है कि जन्म से लेकर करीब 21 वर्ष की उम्र तक बच्चे के संस्कार तेजी से बनते हैं. इसलिए हर उम्र में माता-पिता को कुछ खास बातों का ध्यान रखना चाहिए.

5 साल तक खान-पान पर दें ध्यान

बच्चे के जीवन के शुरुआती पांच साल बहुत अहम होते हैं. इस दौरान उसकी खाने-पीने की आदतें धीरे-धीरे मजबूत होती हैं. इसलिए बच्चे को पौष्टिक और घर का बना भोजन देने की कोशिश करें. बहुत ज्यादा फास्ट फूड, तला-भुना और जरूरत से ज्यादा मसालेदार खाना देने से बचें. इस उम्र में बच्चे आसपास के लोगों की बातों और व्यवहार की नकल भी करते हैं. इसलिए माता-पिता को उनके सामने अच्छे शब्दों और शांत व्यवहार का इस्तेमाल करना चाहिए.

6 से 10 साल में सिखाएं सही और गलत का फर्क

6 से 10 साल की उम्र में बच्चा अच्छी और बुरी आदतों को समझना शुरू करता है. इसी समय उसे घर के नियम, बड़ों का सम्मान, दूसरों की मदद और सही व्यवहार के बारे में समझाया जा सकता है. घर का माहौल बच्चे की सोच पर असर डालता है. इसलिए माता-पिता को खुद भी ऐसा व्यवहार करना चाहिए, जिसे वे बच्चे में देखना चाहते हैं. बच्चे को डांटने के बजाय प्यार से सही और गलत का अंतर समझाएं.

11 से 15 साल में समझें बच्चे की रुचि

इस उम्र में बच्चे पढ़ाई, भविष्य और करियर को लेकर सोचने लगते हैं. माता-पिता को बच्चे की रुचि समझनी चाहिए और अपनी पसंद उस पर नहीं थोपनी चाहिए. पढ़ाई के साथ योग, ध्यान या प्रार्थना जैसी अच्छी आदतों के लिए भी प्रेरित किया जा सकता है. बच्चे से उसकी परेशानी और पसंद के बारे में खुलकर बात करना जरूरी है.

17 से 21 साल में दें जिम्मेदारी

किशोरावस्था के बाद बच्चे में कई बदलाव आते हैं. इस समय उसे छोटी-बड़ी जिम्मेदारियां खुद संभालने का मौका देना चाहिए. माता-पिता जरूरत पड़ने पर उसका मार्गदर्शन करें, लेकिन हर फैसला उसके लिए खुद न लें. उसकी संगति और दिनचर्या पर ध्यान रखें. परिवार के बुजुर्गों के साथ समय बिताने और उनके अनुभव से सीखने के लिए प्रेरित करें.

 

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