कोटा के नांता क्षेत्र में स्थित प्राचीन झारखंड महादेव मंदिर अपने भीतर सैकड़ों साल पुरानी आस्था, इतिहास, तपस्या और एक ऐसी चमत्कारी कहानी समेटे हुए है, जिसे सुनकर आज भी श्रद्धालु हैरान रह जाते हैं. सावन के पवित्र महीने में मंदिर में सुबह से ही भक्तों का तांता लगा हुआ है. हर-हर महादेव के जयकारों से पूरा परिसर गूंज रहा है. शिवलिंग पर जलाभिषेक, दूध-दही, बेलपत्र, सुगंधित पदार्थ, आक, धतूरा, गुलाब और भांग से विशेष अभिषेक किया जा रहा है. ऐसे में चलिए आपको बताते हैं इस खास मंदिर की कहानी...
नांता कोटा शहर के सबसे प्राचीन क्षेत्रों में शुमार है और अपनी ऐतिहासिक व धार्मिक विरासत के लिए अलग पहचान रखता है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में यह इलाका घने जंगल और झाड़ियों से घिरा हुआ था. इसी वजह से इस तपोस्थली का नाम झारखंड महादेव पड़ा. वर्षों से यह स्थान संत-महात्माओं की प्रिय तपोस्थली रहा है. मंदिर परिसर में बक्शुराम महाराज सहित कई संतों की समाधियां भी मौजूद हैं, जिनकी सेवा स्थानीय परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी करते आ रहे हैं.
हाथियों की ताकत भी पड़ गई कम, नहीं हिला पत्थर
मंदिर से जुड़ी सबसे रोचक और चमत्कारी कहानी नांता गढ़ के राजा से जुड़ी है. मंदिर के पुजारी हिमांशु गौतम और पंकज गौतम के अनुसार, उनके पिता से पीढ़ियों से यह कथा सुनते आए हैं. सैकड़ों साल पहले नांता गढ़ के राजा शिकार के लिए जंगल के रास्ते से गुजर रहे थे. इसी दौरान रास्ते की पगडंडी में गड़े एक पत्थर से घोड़ों के टाप फिसल गए और राजा का पूरा काफिला अचानक रुक गया. राजा ने उस पत्थर को रास्ते से हटाने का आदेश दिया.
पत्थर को हटाने के लिए कारीगरों के साथ हाथियों को लगाया गया. भारी लोहे की सांकलों से पत्थर को बांधा गया और हाथियों ने उसे पूरी ताकत से खींचना शुरू किया. लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद पत्थर अपनी जगह से टस-से-मस तक नहीं हुआ. मान्यता है कि पत्थर को खींचने की कोशिश में हाथियों की सूंड तक छिल गई, लेकिन इसके बावजूद वह पत्थर नहीं हिला. काफी प्रयास के बाद राजा को महसूस हुआ कि यह कोई साधारण पत्थर नहीं है. उन्होंने इसे भगवान शिव की इच्छा और दिव्य शक्ति का संकेत माना. इसके बाद राजा ने उसी स्थान पर भगवान शिव का भव्य मंदिर बनवाने का संकल्प लिया. मंदिर के साथ एक ऐतिहासिक बावड़ी का भी निर्माण करवाया गया, जो आज भी इस प्राचीन धरोहर का हिस्सा है.
आज भी दिखते हैं सांकलों के निशान
स्थानीय मान्यता के अनुसार, जिस पत्थर को हटाने के लिए हाथियों की पूरी ताकत लगा दी गई थी, वही पत्थर बाद में स्वयंभू शिवलिंग के रूप में पूजित हुआ. श्रद्धालुओं का दावा है कि मूल शिवलिंग पर आज भी लोहे की सांकलों के निशान दिखाई देते हैं. इन्हीं निशानों को सदियों पुरानी उस कहानी की याद के रूप में देखा जाता है. मंदिर में रखी एक विशेष मूर्ति में नांता गढ़ के राजा को रथ पर सवार और भगवान शिव के सामने समर्पण भाव में दिखाया गया है. यह मूर्ति भी मंदिर की ऐतिहासिक कथा को सामने लाती है.
बिना जलहरी के विराजमान हैं स्वयंभू भोलेनाथ
झारखंड महादेव मंदिर के मूल शिवलिंग की सबसे खास विशेषता इसका स्वरूप है. पुजारी पंकज गौतम के अनुसार, यहां धरती से स्वयं प्रकट हुए गोलाकार स्वयंभू शिवलिंग की पूजा होती है. इस मूल शिवलिंग में जलहरी यानी अर्घा नहीं है. बिना जलहरी के शिवलिंग के इस स्वरूप की पूजा का अपना विशेष आध्यात्मिक महत्व माना जाता है. हालांकि बाद के समय में मंदिर परिसर में अन्य शिवलिंग भी स्थापित किए गए, लेकिन मंडप में स्थापित मूल शिवलिंग ही आज भी यहां मुख्य आराध्य हैं.
सावन में बढ़ जाती है भक्तों की भीड़
सावन की शुरुआत के साथ ही झारखंड महादेव मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. सावन के दूसरे सोमवार सहित पूरे सावन महीने में आसपास के गांवों और कोटा शहर के अलग-अलग इलाकों से भक्त यहां पहुंच रहे हैं. स्थानीय लोगों के मुताबिक सावन की सप्तमी के बाद श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ जाती है. मंदिर परिसर में दिन में कई बार भोलेनाथ का विशेष अभिषेक किया जाता है. भक्त बेल, सुगंधित पदार्थ, दूध, दही, आक, धतूरा, गुलाब और भांग सहित अलग-अलग पूजन सामग्री से भगवान शिव का अभिषेक कर रहे हैं.
पीढ़ियों से जारी है मंदिर की सेवा
बाबा बक्षु राम समाधि स्थल समिति के अध्यक्ष और स्थानीय निवासी भोजराज खटाना के अनुसार, यह क्षेत्र प्राचीन समय से ही साधु-संतों की तपोस्थली रहा है. मंदिर परिसर में मौजूद संतों की समाधियां भी इस स्थान की धार्मिक विरासत को दर्शाती हैं. स्थानीय परिवार लंबे समय से इन समाधियों और मंदिर की सेवा करते आ रहे हैं. नांता निवासी श्रद्धालु कोमल जैठी बताती हैं कि जब से उन्हें होश संभाल आया है, वह हर सोमवार झारखंड महादेव मंदिर आती हैं. सावन में बाबा की सेवा करने का आनंद अलग ही होता है. मंदिर का शांत और हरा-भरा वातावरण भक्ति भाव को और बढ़ा देता है. वह अपनी छोटी बहन के साथ भी यहां सेवा करने आती हैं.
आस्था, इतिहास और प्राकृतिक सुंदरता का संगम
सदियां गुजर गईं, पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन झारखंड महादेव के प्रति लोगों की आस्था आज भी कायम है. घने जंगल और झाड़ियों के बीच कभी एक पत्थर के रूप में मौजूद यह स्थान आज हजारों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है. कहानी चाहे आस्था की हो या इतिहास की, झारखंड महादेव मंदिर की सबसे खास पहचान वही रहस्यमयी शिवलिंग है, जिसे हटाने के लिए राजा के हाथियों ने पूरी ताकत लगा दी थी, लेकिन वह अपनी जगह से नहीं हिला. राजा ने इसे भगवान शिव की इच्छा माना और उसी स्थान को शिवधाम बना दिया.
आज उसी धाम में सावन के दौरान दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं. जलाभिषेक कर भगवान शिव से सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं और मंदिर परिसर हर-हर महादेव के जयकारों से गूंज रहा है. झारखंड महादेव की यह कहानी सिर्फ एक प्राचीन मंदिर की कहानी नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही आस्था, विश्वास, इतिहास और लोकमान्यता की ऐसी विरासत है, जो आज भी लोगों को अपनी ओर खींच रही है.
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