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Pitru Paksha 2026: मौत से पहले ही अपना पिंडदान कर लेते हैं लोग, गया के इस मंदिर में 3 दिन तक चलती है अनोखी रस्म

बिहार के गया में एक ऐसा मंदिर है, जहां जीवित व्यक्ति अपने लिए आत्म श्राद्ध और पिंडदान कर सकता है. जिन लोगों की संतान नहीं है या परिवार में उनके बाद पिंडदान करने वाला कोई नहीं होगा, वे जीवन रहते अपना पिंडदान कर सकते हैं.

pind daan
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 28 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 3:20 PM IST

पितृपक्ष शुरू होते ही देशभर में लोग अपने दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं. आमतौर पर पिंडदान की बात सुनते ही मन में किसी मृत व्यक्ति की तस्वीर आती है. लेकिन बिहार के गया में एक ऐसा मंदिर है, जहां लोग जीते-जी अपना ही पिंडदान कर देते हैं. लेकिन लोग ऐसा करते क्यों हैं, चलिए हम आपको बताते हैं.

दरअसल, बिहार के गया में भस्मकूट पर्वत पर स्थित जनार्दन मंदिर भगवान विष्णु के जनार्दन स्वरूप को समर्पित है. पितृपक्ष के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. मान्यता के अनुसार, यह ऐसा स्थान है जहां जीवित व्यक्ति अपने लिए आत्म श्राद्ध और पिंडदान कर सकता है. गया में पितरों के लिए पिंडदान करने के कई पवित्र स्थल हैं. लेकिन जनार्दन मंदिर की वेदी को जीवित व्यक्ति के आत्मश्राद्ध से जुड़ी खास परंपरा के लिए जाना जाता है. यह मंदिर मां मंगला गौरी मंदिर के उत्तर दिशा में स्थित है.

क्यों करते हैं लोग अपना पिंडदान
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जिन लोगों की संतान नहीं है या परिवार में उनके बाद पिंडदान करने वाला कोई नहीं होगा, वे जीवन रहते अपना पिंडदान कर सकते हैं. इसके अलावा संन्यास या वैराग्य का मार्ग अपनाने वाले लोग भी इस परंपरा का पालन करते हैं. मान्यता है कि पिंडदान और तर्पण से पितरों को शांति और मुक्ति मिलती है. इसी विश्वास के चलते कुछ लोग अपनी मृत्यु से पहले ही अपने लिए यह धार्मिक कर्म पूरा कर लेते हैं.

तीन दिन में पूरा होता है आत्मश्राद्ध
आत्मश्राद्ध की प्रक्रिया करीब तीन दिनों में पूरी होने की मान्यता है. सबसे पहले गया पहुंचकर वैष्णव सिद्धि का संकल्प लिया जाता है और अपने पापों के प्रायश्चित की प्रार्थना की जाती है. इसके बाद जनार्दन स्वामी मंदिर में पूजा-पाठ और जाप किया जाता है.

इस दौरान दही और चावल से तीन पिंड तैयार कर भगवान को अर्पित किए जाते हैं. इस पिंडदान की खास बात यह है कि इसमें तिल का इस्तेमाल नहीं किया जाता. पिंड अर्पित करते समय श्रद्धालु भगवान से प्रार्थना करते हैं कि जीवन रहते वे अपने लिए यह पिंड अर्पित कर रहे हैं और मृत्यु के बाद उन्हें भगवान की कृपा से मोक्ष प्राप्त हो.

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