एक तपस्या, मां के स्वयं प्रकट होने की मान्यता और आस्था की अनोखी परंपराएं. राजगढ़ की जालपा डूंगरी का इतिहास सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा है. जिला मुख्यालय से करीब 7 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर विराजमान सिद्धपीठ मां जालपा देवी के दरबार में शारदीय नवरात्रि के पहले दिन रविवार सुबह से ही श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया. मध्यप्रदेश और राजस्थान सहित दूर-दराज से महिलाएं, पुरुष, युवा और बच्चे मां के दर्शन करने पहुंचे. भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद मां जालपा जरूर पूरी करती हैं. यहां उल्टा स्वास्तिक बनाकर मन्नत मांगने और मनोकामना पूरी होने पर उसे सीधा करने की परंपरा इस मंदिर को विशेष पहचान देती है.
1100 साल पहले ज्वाला नाथ जी ने की थी तपस्या
मंदिर के पंडा प्रभु लाल नाथ के अनुसार, मां जालपा का मंदिर करीब 1100 वर्ष पुराना है. उनके कुल के ज्वाला नाथ जी ने लगभग 11 सौ वर्ष पहले कठोर तपस्या कर मां को प्रसन्न किया था. मान्यता है कि उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां यहां स्वयं प्रकट हुईं. मां की प्रतिमा को स्वयंभू माना जाता है. बताया जाता है कि प्राचीन समय में मां पीपल के पेड़ के नीचे बने कच्चे चबूतरे पर विराजमान थीं. मंदिर के सेवादार अशोक द्विवेदी के मुताबिक, यह स्थान प्राचीन काल से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है. घने जंगलों से घिरी इस पहाड़ी पर मां जालपा की पूजा-अर्चना की जाती थी और वे भील राजाओं की आराध्य देवी थीं.
उल्टा स्वास्तिक बनाकर मांगते हैं मन्नत
मां जालपा के दरबार में आस्था की एक अनोखी परंपरा देखने को मिलती है. श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर मंदिर की दीवारों पर उल्टा स्वास्तिक बनाते हैं. मान्यता है कि जब उनकी मुराद पूरी हो जाती है, तो वे दोबारा मां के दरबार में पहुंचकर उस स्वास्तिक को सीधा करते हैं. कई भक्त चांदी का स्वास्तिक भी मां को अर्पित करते हैं. इसी तरह विवाह में बाधा आने या शुभ मुहूर्त नहीं निकलने पर श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर पुजारी से 'पाती' निकालते हैं. मान्यता के अनुसार, यहां से मिली पाती को शुभ मानकर विवाह की तारीख तय की जाती है. मंदिर से साल भर में सैकड़ों पातियां जारी होने की बात भी बताई जाती है.
भील राजाओं से राजगढ़ रियासत तक जुड़ा इतिहास
प्रचलित इतिहास के अनुसार, प्राचीन समय में राजगढ़ को झूनझूनीपुर के नाम से जाना जाता था और यहां भील राजाओं का शासन था. मां जालपा उनकी आराध्य देवी थीं. वर्ष 1644 में राजा मोहन सिंह ने भील राजा चक्रसेन को परास्त किया था, जिसमें खिलचीपुर के राजा उग्रसेन ने भी साथ दिया. इसके बाद भील राजा राजगढ़ छोड़कर चला गया. मान्यता है कि राजा मोहन सिंह को स्वप्न में मां के दर्शन हुए, जिसके बाद उन्होंने मां जालपा रानी की पूजा शुरू की और झूनझूनीपुर का नाम बदलकर राजगढ़ रखा. आगे चलकर उनके वंशज महाराज बहादुर सिंह ने 1882 से 1898 के बीच जालपा देवी की डूंगरी पर मंदिर निर्माण कराया. मान्यता है कि मां ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर कहा था कि वे छाया के नीचे नहीं रह सकतीं. वर्ष 1995 में श्रद्धालुओं और राजगढ़ विकास ट्रस्ट द्वारा मंदिर निर्माण का कार्य कराया गया.
नेताओं और अधिकारियों की भी गहरी आस्था
मां जालपा का दरबार आम श्रद्धालुओं के साथ-साथ बड़े नेताओं और अधिकारियों की आस्था का केंद्र भी है. मंदिर के पंडा के अनुसार, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और दिग्विजय सिंह, उमा भारती, यशोधरा राजे सिंधिया, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, आरएसएस के पूर्व सरकार्यवाह सुरेश सोनी, पूर्व सांसद लक्ष्मण सिंह, विधायक व पूर्व विधायक बापू सिंह तंवर और राजगढ़ सांसद रोडमल नागर सहित कई नेता यहां दर्शन करने पहुंचते रहे हैं. जिले में पदस्थ होने वाले कई वरिष्ठ अधिकारी भी कार्यभार संभालने से पहले मां के दरबार में माथा टेकने आते हैं.
पहाड़ी पर सड़क और सीढ़ियों से पहुंचते हैं भक्त
करीब 800 मीटर ऊंची बताई जाने वाली इस पहाड़ी पर पहुंचने के लिए सड़क और सीढ़ियों, दोनों मार्गों की सुविधा है. मंदिर ट्रस्ट द्वारा मां जालपा मंदिर के सामने हनुमान जी का मंदिर भी बनाया गया है. सुरक्षा की दृष्टि से पहाड़ी पर पुलिस चौकी और गार्ड तैनात रहते हैं. दिल्ली, मुंबई और राजस्थान सहित दूर-दराज से श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. नवरात्रि में मंदिर परिसर में भक्तों की आवाजाही बढ़ जाती है. ज्वाला नाथ जी की तपस्या से जुड़ी मान्यता, स्वयंभू प्रतिमा, उल्टे स्वास्तिक की परंपरा और विवाह के लिए पाती निकलवाने की मान्यता ने जालपा डूंगरी को राजगढ़ ही नहीं, बल्कि आसपास के राज्यों के श्रद्धालुओं के बीच भी विशेष धार्मिक पहचान दिलाई है.
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