सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति के लिए बेहद खास माना जाता है. देशभर के शिव मंदिरों में इस दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है. इनमें मध्यप्रदेश के उज्जैन में स्थित श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का अपना अलग महत्व है. यह भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में तीसरा ज्योतिर्लिंग माना जाता है. यहां भगवान शिव को महाकाल यानी काल के भी स्वामी के रूप में पूजा जाता है. मान्यता है कि महाकाल अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें भय से मुक्ति देते हैं.
महाकालेश्वर मंदिर की सबसे खास बात यहां होने वाली भस्म आरती है. सुबह होने से पहले होने वाली इस आरती में भगवान महाकाल का विशेष श्रृंगार किया जाता है. सावन सोमवार के दिनों में इस आरती और दर्शन के लिए देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं.
राक्षस के आतंक से परेशान थे उज्जैन के लोग
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा शिव पुराण से जुड़ी है. मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में उज्जैन के लोगों को दूषण नाम के राक्षस ने परेशान कर रखा था. उसके अत्याचार से लोग भयभीत थे. उन्होंने भगवान शिव की आराधना शुरू की और उनसे रक्षा की प्रार्थना की. भक्तों की पुकार सुनकर भगवान शिव दिव्य ज्योति के रूप में प्रकट हुए. उन्होंने दूषण का वध किया और उज्जैन के लोगों को उसके आतंक से मुक्त कराया. इसके बाद भक्तों के आग्रह पर भगवान शिव इसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हो गए. तभी से यहां भगवान शिव को महाकाल के नाम से पूजा जाता है. मान्यता है कि महाकाल अपने भक्तों की रक्षा करने वाले देवता हैं. यही वजह है कि उज्जैन के लोगों के लिए महाकाल केवल आराध्य नहीं, बल्कि उनके राजा और रक्षक भी माने जाते हैं.
महाकाल यानी काल के भी स्वामी
हिंदू मान्यताओं में भगवान शिव को जन्म और मृत्यु के चक्र से परे माना गया है. इसी वजह से महाकाल को काल का भी स्वामी कहा जाता है. महाकालेश्वर मंदिर में भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग गर्भगृह के सबसे निचले स्तर पर स्थापित है. इसके ऊपर ओंकारेश्वर महादेव विराजमान हैं, जबकि सबसे ऊपरी स्तर पर नागचंद्रेश्वर मंदिर है. नागचंद्रेश्वर मंदिर की खास बात यह है कि इसके कपाट साल में केवल एक दिन नाग पंचमी के अवसर पर श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं.
12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे अलग है महाकालेश्वर
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग को भारत के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में विशेष स्थान प्राप्त है. यह उज्जैन नगरी में स्थित है, जिसे प्राचीन समय से ही धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र माना जाता रहा है. महाकालेश्वर को 12 ज्योतिर्लिंगों में एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग भी माना जाता है. मंदिर की वास्तुकला में भूमिज, चालुक्य और मराठा शैली का प्रभाव दिखाई देता है. समय के साथ मंदिर का कई बार निर्माण और पुनर्निर्माण हुआ. वर्तमान मंदिर का स्वरूप करीब डेढ़ सौ साल पहले सिंधिया प्रशासन से जुड़े रामचंद्र बाबा शेणवी के प्रयासों से विकसित हुआ माना जाता है.
भस्म आरती है मंदिर की सबसे बड़ी पहचान
महाकालेश्वर मंदिर की पहचान देश-दुनिया में सबसे ज्यादा भस्म आरती से होती है. यह आरती तड़के सुबह की जाती है. इसमें भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है. भस्म जीवन की नश्वरता का प्रतीक मानी जाती है. इसका संदेश है कि संसार में सब कुछ नश्वर है और अंत में हर व्यक्ति को पंचतत्व में विलीन होना है. भगवान शिव के महाकाल स्वरूप के साथ भस्म आरती इसी सत्य की याद दिलाती है. आरती के दौरान मंदिर परिसर में मंत्रोच्चार और शिव स्तुति से वातावरण भक्तिमय हो जाता है. इस अद्भुत अनुष्ठान को देखने के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से उज्जैन पहुंचते हैं. सावन और महाशिवरात्रि के दौरान यहां भक्तों की संख्या और भी बढ़ जाती है.
सावन सोमवार को उमड़ता है आस्था का सैलाब
सावन में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व है. इस महीने के सोमवार को श्रद्धालु व्रत रखते हैं और शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करते हैं. उज्जैन में सावन सोमवार का उत्सव और भी खास हो जाता है. इस दौरान महाकाल की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. भगवान महाकाल की सवारी भी धार्मिक परंपरा का प्रमुख हिस्सा है. मान्यता है कि सावन में महाकाल नगर भ्रमण पर निकलकर अपने भक्तों को दर्शन देते हैं.
नागचंद्रेश्वर से लेकर महाशिवरात्रि तक खास है मंदिर
महाकालेश्वर मंदिर में पूरे साल अलग-अलग पर्वों पर विशेष आयोजन होते हैं. नाग पंचमी के दिन नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट खुलना यहां की सबसे अनोखी परंपराओं में शामिल है. इस दिन बड़ी संख्या में भक्त नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. इसके अलावा महाशिवरात्रि पर भी मंदिर में विशेष आयोजन होते हैं. सावन के सोमवार, शिव नवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर महाकाल की पूजा और श्रृंगार के विशेष दर्शन किए जाते हैं.
महाकाल के दरबार में पहुंचना माना जाता है सौभाग्य
महाकालेश्वर की यात्रा भक्तों के लिए सिर्फ मंदिर दर्शन तक सीमित नहीं है. यह उनके लिए आस्था और आध्यात्मिक अनुभव की यात्रा होती है. भस्म आरती के मंत्र, मंदिर में गूंजते जयकारे और महाकाल के दर्शन श्रद्धालुओं को अलग ही आध्यात्मिक अनुभूति देते हैं. सावन सोमवार के दिन महाकाल के दरबार में पहुंचकर भक्त भगवान शिव से सुख-शांति, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करते हैं.
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