आमतौर पर सुहागनों को सफेद चीजों से दूर रखा जाता है, क्योंकि सफेद रंग शादीशुदा महिलाओं के जीवन में अशुभ का प्रतीक माना जाता है. हालांकि, बंगाल की महिलाएं सफेद रंग की चूड़ी पहनती हैं, जिसे शाखा कहा जाता है. वैसे तो बाजार में इसकी कीमत 100-200 रुपये से शुरू होती है, लेकिन खास मौकों पर बंगाली महिलाएं इसके लिए लाखों रुपए तक खर्च करने को तैयार रहती हैं. इसकी कीमत शंख की गुणवत्ता और बनावट पर भी निर्भर करती है.
इसके साथ महिलाएं लाल रंग की चूड़ी भी पहनती हैं, जिसे पोला कहा जाता है. पोला लाल मूंगे (कोरल) से बनाया जाता है. अगर आप कभी बंगाल जाएंगे, तो वहां की महिलाएं अकसर कलाई में शाखा और पोला एक साथ पहने नजर आएंगी. यह केवल परंपरा या फैशन का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसके पीछे सांस्कृतिक और वैज्ञानिक दोनों वजहें भी मानी जाती हैं. आइए समझते है कि कैसे ये बंगाल में वैवाहिक जीवन से जुड़ी गहरी मान्यताओं का हिस्सा भी है.
किस चीज से बनता है शाखा?
'शाखा' सफेद रंग की चूड़ी होती है, जिसे शंख यानी कॉन्च शेल को तराशकर बनाया जाता है. वहीं, इसके साथ पहनी जाने वाली लाल चूड़ी को 'पोला' कहा जाता है, जो लाल मूंगे से तैयार की जाती है. अगर आप बंगाल की किसी शादी में जाएं या वहां की महिलाओं को देखें, तो पाएंगे कि ज्यादातर विवाहित महिलाएं शाखा और पोला एक साथ पहनती हैं. कई महिलाएं इसके साथ लोहे का कड़ा भी पहनती हैं, जिसे शुभ माना जाता है और इससे नकारात्मक एनर्जी दूर रहती है.
सुहाग की निशानी
बंगाली समाज में शाखा-पोला का महत्व वैसा ही माना जाता है, जैसा कई जगहों पर सिंदूर या मंगलसूत्र का होता है. इसे शादीशुदा होने की पहचान समझा जाता है. अविवाहित लड़कियां इसे नहीं पहनतीं. मान्यता है कि इसे पहनने से पति की लंबी उम्र, परिवार की खुशहाली और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है. शादी के बाद जब दुल्हन पहली बार इसे पहनती है, तो वह पल काफी खास माना जाता है.
केवल बंगाल ही नहीं, बल्कि बिहार के मिथिला, ओडिशा, असम और झारखंड के कल्चर का भी ये हिस्सा है. इस जगहों की शादी-शुदा महिला भी इसे पहनती हैं.
सफेद रंग के पीछे छिपा है खास मतलब
यह सुनने में थोड़ा अलग लग सकता है कि जहां सफेद रंग को कई जगह अशुभ माना जाता है, वहीं बंगाल में वही रंग शुभता का प्रतीक बन जाता है. दरअसल, शाखा का सफेद रंग शांति, पवित्रता और नए जीवन की शुरुआत को दर्शाता है. लोगों का मानना है कि शाखा शंख से बना होता है, जो देवी लक्ष्मी का प्रतीक भी है. वहीं कुछ लोग बताते हैं कि पारंपरिक तौर पर इसे हाथी के दांत से बनाया जाता था इस और हाथी देवी का प्रतीक होता है. यही वजह है कि बंगाली महिलाएं इसे बड़े सम्मान के साथ पहनती हैं.
वैज्ञानिक वजह
कई लोग मानते हैं कि शाखा सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि इसका शरीर पर भी सीधा असर होता है. असली शंख कैल्शियम कार्बोनेट से बना होता है. माना जाता है कि इससे हड्डियां मजबूत होती है और रक्त संचार अच्छा रहता है.
लाखों रुपए तक क्यों खर्च करती हैं महिलाएं?
नॉर्मल शाखा-पोला बाजार में कम कीमत में भी मिल जाता है, लेकिन खास मौकों के लिए कई महिलाएं डिजाइनर सेट बनवाती हैं. इनमें सोने की कारीगरी, मीनाकारी और बारीक डिजाइन जोड़े जाते हैं, जिससे इनकी कीमत हजारों से लेकर लाखों रुपये तक पहुंच जाती है. यही वजह है कि बंगाल में शाखा-पोला सिर्फ गहना नहीं, बल्कि परंपरा, आस्था और सुहाग का बेहद खास प्रतीक माना जाता है.
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