पौड़ी शहर के आराध्य देव श्री कंडोलिया ठाकुर के वार्षिक पूजन एवं भंडारे का शुभारंभ हो गया है. 19, 20 और 21 जून तक चलने वाले इस तीन दिवसीय धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना करने के साथ ही प्रसाद ग्रहण करते हैं. हर वर्ष आयोजित होने वाले इस भव्य कार्यक्रम में लाखों श्रद्धालुओं की आस्था देखने को मिलती है.
मंदिर समिति से जुड़े लोगों के अनुसार, कंडोलिया मंदिर के वार्षिक तीन दिवसीय आयोजन की शुरुआत पहले दिन आसपास के गांवों से देव निशानों को पूरे विधि-विधान और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मंदिर परिसर तक लाने से होती है. इस दौरान श्रद्धालु जयकारों और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ देव निशानों का स्वागत करते हैं.
भजन-कीर्तन और रात्रि जागरण का होता है आयोजन
आयोजन के दूसरे दिन मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन, धार्मिक कार्यक्रमों और रात्रि जागरण का आयोजन किया जाता है. इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर देवता का गुणगान करते हैं और पूरी रात भक्ति रस में सराबोर रहते हैं. तीसरे और अंतिम दिन विशेष हवन-पूजन एवं धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है. पूजा-अर्चना संपन्न होने के बाद विशाल भंडारे का आयोजन होता है, जिसमें स्थानीय लोगों के साथ दूर-दराज से पहुंचे हजारों श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं. यह भंडारा कंडोलिया मंदिर के वार्षिक उत्सव का सबसे महत्वपूर्ण और आकर्षक हिस्सा माना जाता है. आयोजन के दौरान पूरे क्षेत्र में भक्तिमय वातावरण बना रहता है.
सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक
कंडोलिया मंदिर का यह वार्षिक उत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि पौड़ीवासियों की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है. विशेष बात यह है कि रोजगार और अन्य कारणों से देश के विभिन्न शहरों में रहने वाले पौड़ी के लोग भी इस अवसर पर अपने घर लौटकर आयोजन में शामिल होते हैं. उनका मानना है कि श्री कंडोलिया ठाकुर सदैव पौड़ीवासियों के सुख-दुख में उनके साथ रहते हैं. इसलिए इस वार्षिक पूजन में शामिल होना उनकी आस्था और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है. श्रद्धा, सेवा और सामुदायिक सहयोग का यह अनूठा संगम हर वर्ष पौड़ी की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करता है.
क्या है कंडोलिया मंदिर का इतिहास?
पौड़ी शहर के शीर्ष पर स्थित कंडोलिया मंदिर क्षेत्र की आस्था और धार्मिक परंपराओं का प्रमुख केंद्र है. लोकमान्यताओं के अनुसार, बहुत वर्षों पहले कुमाऊं की एक युवती का विवाह पौड़ी गांव के डुंगरियाल नेगी परिवार में हुआ था. विवाह के बाद वह अपने ईष्ट देवता को एक कंडी (छोटी टोकरी) में रखकर अपने साथ लाई थी. माना जाता है कि इसी कारण देवता को "कंडोलिया देवता" के नाम से जाना जाने लगा और उनकी पूजा पौड़ी गांव में आरंभ हुई.
स्वप्न में मिला था मंदिर स्थापना का आदेश
कहा जाता है कि बाद में कंडोलिया देवता गांव के एक व्यक्ति के स्वप्न में प्रकट हुए और अपना मंदिर किसी ऊंचे स्थान पर स्थापित करने का आदेश दिया. इसके बाद देवता की स्थापना पौड़ी शहर के ऊपर स्थित पहाड़ी पर की गई. स्थापना के बाद से ही कंडोलिया देवता न्याय के देवता के रूप में प्रसिद्ध हो गए. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, कंडोलिया देवता भगवान शिव का ही एक स्वरूप हैं और अपने भक्तों को संकटों एवं संभावित अनिष्ट की पूर्व चेतावनी भी देते हैं.
प्राकृतिक सौंदर्य और आस्था का अद्भुत संगम
घने देवदार और अन्य हरे-भरे वृक्षों से घिरा मंदिर परिसर प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक शांति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है. वर्षभर श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं, लेकिन जून माह में आयोजित होने वाला तीन दिवसीय वार्षिक पूजन और विशाल भंडारा विशेष महत्व रखता है. इस दौरान पौड़ी सहित प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर दर्शन करते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं.
कंडोलिया मंदिर का यह वार्षिक आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत, लोक आस्थाओं और सामाजिक एकता का भी प्रतीक माना जाता है. हर वर्ष आयोजित होने वाला यह भव्य कार्यक्रम मंदिर का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन होता है, जो श्रद्धा और सामुदायिक सहभागिता का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है.
(रिपोर्ट- सिद्धांत उनियाल)
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