शरद पूर्णिमा की मनमोहक चांदनी, चंद्रमा की 16 कलाओं और मां लक्ष्मी की पूजा का खास महत्व है. इस दिन लोग घरों और मंदिरों में खीर बनाकर चंद्रमा की रोशनी में रखते हैं. धार्मिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की चांदनी अमृत के समान होती है और इस रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं. मान्यता है कि इस दिन पूजा-पाठ और जागरण करने से घर में सुख-समृद्धि आती है. इस बार शरद पूर्णिमा 25 अक्टूबर को मनाई जा रही है. इसे लेकर काशी में भी विशेष तैयारियां की जा रही हैं.
काशी में 44 साल से हो रही मां लक्ष्मी की विशेष पूजा
काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व न्याय परिषद अध्यक्ष आचार्य अशोक कुमार द्विवेदी पिछले 44 वर्षों से शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी की विशेष आराधना कर रहे हैं. इस अवसर पर शनिवार से ही महायज्ञ के मुख्य अनुष्ठान शुरू हो गए हैं. इसमें 21 वैदिक ब्राह्मण पूजन कर रहे हैं. अनुष्ठान के दौरान श्री यंत्र की स्थापना, विधिवत पूजन, श्री मंत्र का जाप, सहस्रार्चन और हवन किया जाएगा. इन धार्मिक अनुष्ठानों के जरिए मां महालक्ष्मी की आराधना की जा रही है.
25 अक्टूबर को मनाई जाएगी शरद पूर्णिमा
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के प्रोफेसर विनय कुमार पाण्डेय के अनुसार, शरद पूर्णिमा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है. सनातन धर्म में इस पर्व का विशेष महत्व है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी चांदनी को अमृत के समान कल्याणकारी माना जाता है. पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को सुबह करीब 11:55 बजे शुरू होकर 26 अक्टूबर को सुबह करीब 9:41 बजे तक रहेगी. शरद पूर्णिमा का मुख्य पर्व 25 अक्टूबर की रात मनाया जाएगा. चंद्रोदय का समय अलग-अलग स्थानों पर अलग हो सकता है. ऐसे में श्रद्धालु स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का समय तय कर सकते हैं.
चंद्रमा की 16 कलाओं से जुड़ी है मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है. हिंदू धर्म में 16 कलाओं को पूर्णता, समृद्धि और आदर्श व्यक्तित्व का प्रतीक माना जाता है. यही वजह है कि इस रात चंद्रदेव की पूजा और चांदनी के दर्शन का खास महत्व बताया गया है. मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की चांदनी में अमृत के समान गुण होते हैं. इसी आस्था के चलते लोग खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे रखते हैं और अगले दिन इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं.
मां लक्ष्मी की पूजा से जुड़ी है सुख-समृद्धि की कामना
शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है. प्रोफेसर विनय कुमार पाण्डेय के अनुसार, इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा का विशेष विधान है. धार्मिक मान्यता है कि इस रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जागने वाले भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं. कोजागरी शब्द को 'कौन जाग रहा है' की मान्यता से जोड़ा जाता है. इसी कारण कई परिवारों में रातभर जागकर मां लक्ष्मी की पूजा, मंत्र-जाप और भजन किए जाते हैं. श्रद्धालु घरों की साफ-सफाई करके पूजा स्थल सजाते हैं. मां लक्ष्मी और चंद्रदेव को फूल, अक्षत, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है. चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की जाती है.
चांदनी में खीर रखने की परंपरा का क्या है महत्व
शरद पूर्णिमा पर दूध, चावल और चीनी से खीर बनाने की परंपरा है. इसे भगवान को अर्पित करने के बाद चंद्रमा की रोशनी में रखा जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, चंद्रमा की किरणों के संपर्क में आने से खीर अमृत के समान गुणों वाली हो जाती है. अगले दिन इसे प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों और परिचितों में बांटा जाता है. हालांकि, खीर को खुले में रखने के बजाय किसी साफ, सुरक्षित और ढके हुए स्थान पर रखना बेहतर है, ताकि उसमें धूल, कीड़े या दूसरी अशुद्धियां न पड़ें.
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