व्रत या उपवास वैज्ञानिक रूप से और अध्यात्मिक रूप से भी रखा जाता है. इसका मूल उद्देश्य वैज्ञानिक रूप से शरीर को स्वस्थ्य रखना होता है. अध्यात्मिक रूप से व्रत से मन और आत्मा को नियंत्रित किया जाता है. अलग-अलग तिथियां अलग-अलग तरह से मन और शरीर पर असर डालती हैं. जिसको ध्यान में रखकर अलग-अलग तिथियों को उपवास या व्रत का विधान बनाया गया है. विशेष तिथियों को व्रत-उपवास रखने से शरीर और मन तो शुद्ध होता ही है इसके साथ ही मनचाही इच्छाएं भी पूरी होती हैं.
व्रत और उपवास का क्या है अर्थ?
उपवास में उप का अर्थ समीप और वास का अर्थ है बैठना या रहना, यानी अपने भगवान में ध्यान लगाकर बैठना. उनका नाम जपना और उनकी स्तुति करना. उपवास में निराहार रहना पड़ता, यानी बिना आहार ग्रहण करें हुए रहना पड़ता है. वहीं, व्रत का अर्थ का किसी चीज का संकल्प लेकर व्रत का पालन करना, इसे व्रत कहा जाता है. आप किसी भी एक समय व्रत में खाना खा सकते है.
क्या हैं व्रत रखने के नियम
व्रत दो प्रकार से रखा जाता है. निर्जल व्रत और फलाहारी या जलीय व्रत. सामान्यतः निर्जल व्रत पूर्ण रूप से स्वस्थ्य व्यक्ति को ही रखना चाहिए. अन्य या सामान्य लोगों को जलीय उपवास रखना चाहिए. व्रत में अधिक से अधिक समय ईश्वर ध्यान या उपासना में लगाना चाहिए. बहुत जरूरी हो तो फलाहार कर सकते हैं. व्रत की समाप्ति अगले दिन सूर्योदय के बाद निंबू पानी पीकर करनी चाहिए. अगले दिन पारण करने के पूर्व भोजन या अन्न का दान करना चाहिए.
तिथि और दिन के उपवास में क्या है अंतर
तिथियों का मन पर अलग-अलग असर पड़ता है. दिनों का ग्रहों से कोई विशेष संबंध नहीं है और न ही दिनों का अलग से मन पर कोई असर पड़ता है. इसलिए दिनों का उपवास आपको मानसिक रूप से सांत्वना भले ही दे दें, वास्तविक रूप से दिनों के उपवास से कोई लाभ नहीं होता. यह केवल निराहार रहने की प्रक्रिया है.
कौन सा उपवास रखना सबसे ज्यादा है फलदायी
यदि उपवास रखना है तो एकादशी, प्रदोष, पूर्णिमा या अमावस्या का रखना चाहिए.इनमें भी एकादशी का उपवास सर्वोत्तम माना जाता है. अगर नियमित उपवास न रख सकें तो साल में दो बार नवरात्रि का उपवास रखें. उपवास जब भी रखें, बेहतर होगा कि जल ही ग्रहण करें. यदि फल ग्रहण करना है तो रसदार फल ही ग्रहण करें.
किन कारणों से लोग रखते हैं व्रत
हिंदू धर्म में अलग-अलग कामनाओं की पूर्ति के लिए लोग अलग-अलग देवी-देवताओं से जुड़े व्रत करते हैं. इनमें से कुछ की ईश्वर के प्रति धार्मिक आस्था रखते हुए व्रत रखते हैं तो कुछ भगवान के भय से भी व्रत रखते हैं. व्रत को रखने के पीछे कई बार ज्योतिषीय (Astrology) कारण भी होता है. जैसे कुछ लोग शनि मंगल आदि से जुड़े दोष को दूर करने और उनकी शुभता पाने के लिए व्रत को रखते हैं. आत्म शुद्धि के लिए भी कुछ लोग व्रत रखते हैं, लेकिन कामनाओं की पूर्ति से जुड़े लोगों के मुकाबले इनकी संख्या कम ही होती है.