दिवाली एक ऐसा त्योहार है, जो न केवल देश में, बल्कि विदेशों में भी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय (एनआरआई) और स्थानीय लोग भी इसका आयोजन बड़े स्तर पर करते हैं. नेपाल, मलेशिया, सिंगापुर और अन्य देशों में इस खास दिन विशेष आयोजन देखने को मिलते हैं. कार्तिक मास की अमावस्या को और सनातन पंचांग के हिसाब से दशहरा के ठीक 20 दिन बाद दीपावली मनाई जाती है.
दरअसल, दशहरा के दिन रावण का वध कर भगवान श्रीराम माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्षों का वनवास काटकर कार्तिक मास की अमावस्या को अयोध्या पहुंचे थे. उनके स्वागत के लिए समस्त अयोध्यावासियों ने घी के दीये जलाकर दीपोत्सव मनाया. तभी से दीपावली पर दीये जलाने की परंपरा चली आ रही है और घरों को दुल्हन की तरह रोशनी से सजाया जाता है. लेकिन आप भी सोच रहे होंगे कि अगर इस दिन भगवान राम पत्नी और भाई के साथ अयोध्या लौटे थे, तो फिर लक्ष्मी-गणेश की पूजा का चलन कैसे शुरू हुआ? चलिए, आपको बताते हैं.
लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा की कहानी
मां लक्ष्मी और भगवान गणेश को एक साथ पूजने के पीछे एक प्रचलित धार्मिक कथा सुनाई जाती है. इस कथा के अनुसार, एक बार मां लक्ष्मी के मन में मातृत्व इच्छा जाग्रति हुई. तब वह भगवान विष्णु से अपने मन की बात कहीं. जिसे सुनकर भगवान विष्णु ने उन्हें मां पार्वती से मिलने को कहा. इसके बाद वह माता पार्वती के पास पहुंचीं और उनसे उनके पुत्र गणेश को गोद लेने की इच्छा जताई.
माता पार्वती ने पहले इस बात पर संकोच किया, लेकिन मां लक्ष्मी के आग्रह पर उन्होंने गणेश जी को उन्हें सौंप दिया. इससे मां लक्ष्मी बहुत प्रसन्न हुईं. उन्होंने गणेश जी को अपना पुत्र मानकर उन्हें सुख-समृद्धि और वैभव का आशीर्वाद दिया. साथ ही यह भी कहा कि जो भक्त उनकी पूजा करेगा, उसे गणेश जी की पूजा भी करनी होगी. तभी उसे उनकी कृपा प्राप्त होगी. वैसे भी भगवान गणेश मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु के भांजे लगते हैं. और भांजा पुत्र सामान ही होता है. शिव पुराण के अनुसार, मां पार्वती ने एक बार विष्णु भगवान को राखी बंधा था. मान्यता है कि तब से राखी बांधने की भी परंपरा चली आ रही है.
दीपावली पर लक्ष्मी संग गणेश पूजा का महत्व
दीपावली पर मां लक्ष्मी की पूजा धन, सुख और समृद्धि की कामना के लिए की जाती है. वहीं भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक और विघ्नहर्ता के रूप में पूजा जाता है. मान्यता है कि धन प्राप्त करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उसे सही तरीके से इस्तेमाल करना भी है. मां लक्ष्मी समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं, जबकि गणेश जी सही निर्णय लेने की बुद्धि और काम में आने वाली बाधाओं को दूर करने की कृपा करते हैं.
धार्मिक परंपरा में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से की जाती है. शिव पुराण में भी गणेश जी के प्रथम पूज्य बनने से जुड़ी कथा मिलती है. इसके अनुसार, जब गणेश जी और कार्तिकेय के बीच पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले लौटने की प्रतियोगिता हुई, तो गणेश जी ने अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की परिक्रमा की. उन्होंने माता-पिता को ही अपना पूरा संसार बताया. उनकी बुद्धिमानी से प्रसन्न होकर उन्हें प्रथम पूज्य होने का आशीर्वाद मिला. मां लक्ष्मी ने भी विघ्न हरता गणेश को वरदान दिया कि जो भक्त लक्ष्मी पूजन के दिन उनके साथ गणेश की पूजा करेगा, उसके घर कभी भी धन की कमी नहीं होगी.
समुद्र मंथन से हुआ था मां लक्ष्मी का प्राकट्य
मां लक्ष्मी के प्राकट्य की कथा श्रीमद्भागवत पुराण में मिलती है. समुद्र मंथन के दौरान कई दिव्य वस्तुओं के साथ मां लक्ष्मी भी क्षीरसागर से प्रकट हुई थीं. इसके बाद उन्होंने भगवान विष्णु को अपना पति चुना. पुराणों में मां लक्ष्मी को धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी बताया गया है. यही वजह है कि दीपावली के रात में मां लक्ष्मी की पूजा को शुभ माना जाता है. इस दिन भक्त मां लक्ष्मी से घर में सुख-समृद्धि और गणेश जी से बुद्धि, विवेक और जीवन की बाधाएं दूर करने की प्रार्थना करते हैं. यानी इस पूजा में केवल धन पाने की कामना नहीं, बल्कि उसे समझदारी से संभालने का भाव भी जुड़ा है, जिसमें गणेश जी अहम भूमिका निभाते हैं.
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