वाराणसी में बाबा विश्वनाथ और भगवान जगन्नाथ की पूजा परंपराओं का अनूठा संगम देखने को मिलता है. काशी के विश्वेश्वर खंड में विराजमान बाबा विश्वनाथ का प्रतिदिन जलाभिषेक होता है, जबकि केदारखंड स्थित भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का अभिषेक वर्ष में सिर्फ एक बार, ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा के दिन किया जाता है.
51 घड़ों के गंगाजल से हुआ महाअभिषेक
बुधवार सुबह श्री जगन्नाथ जी ट्रस्ट के तत्वावधान में सुबह 5 बजे अस्सी घाट से जलयात्रा निकाली गई. श्रद्धालुओं ने मिट्टी के घड़ों में गंगाजल भरकर मंदिर पहुंचकर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का जलाभिषेक किया. पहले 51 मिट्टी के घड़ों में रखे गंगाजल से महाअभिषेक हुआ, इसके बाद भक्तों ने दोपहर 12 बजे तक लगातार गंगाजल अर्पित किया.
ज्यादा स्नान से 'बीमार' पड़ जाते हैं भगवान
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भक्तों द्वारा किए जाने वाले अत्यधिक जलाभिषेक के कारण भगवान जगन्नाथ अस्वस्थ हो जाते हैं. इसके बाद वे 15 दिनों तक विश्राम करते हैं. इस अवधि को भगवान के 'अनासर' काल के रूप में माना जाता है, जब उनके दर्शन भी बंद रहते हैं.
15 दिन तक काढ़े का लगता है भोग
भगवान के विश्राम काल में प्रतिदिन उन्हें औषधीय काढ़े का भोग लगाया जाता है. यही काढ़ा बाद में प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है. मान्यता है कि 15 दिन बाद स्वस्थ होने पर भगवान डोली में विराजमान होकर मंदिर से निकलते हैं और इसके बाद भव्य रथयात्रा का आयोजन होता है.
रथयात्रा के साथ सजता है काशी का प्रसिद्ध लक्खा मेला
भगवान जगन्नाथ की नगर यात्रा के साथ वाराणसी का प्रसिद्ध रथयात्रा मेला शुरू होता है, जिसे शहर के प्रमुख लक्खा मेलों में गिना जाता है. तीन दिनों तक चलने वाले इस मेले में देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं.
श्रद्धालुओं ने मांगा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद
जलाभिषेक में शामिल श्रद्धालुओं ने भगवान जगन्नाथ से परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की. कई श्रद्धालुओं ने बताया कि वे वर्षों से इस परंपरा का हिस्सा बनते आ रहे हैं.
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