श्री कृष्ण के मुकुट का मोरपंख क्यों है खास? जानिए इसके पीछे छिपा रहस्य...

कृष्ण द्वारा मोरपंख धारण करना एक सोचा-समझा और गहरे अर्थों से भरा प्रतीक है. तो चलिए आज आपको बताते हैं कि आखिर क्यों भगवान कृष्ण सिर पर मोर पंख धारण करते हैं.

भगवान श्रीकृष्ण
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 27 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:14 PM IST

भगवान श्रीकृष्ण हमेंशा हाथ में बांसुरी, पीले वस्त्र और सिर पर मोरपंख लिए नजर आते हैं. मंदिरों की मूर्तियों से लेकर प्राचीन ग्रंथों, लोक कथाओं और चित्रकला तक, कृष्ण का यह स्वरूप समय के साथ नहीं बदला. आमतौर पर लोग मोर पंख को सिर्फ सुंदरता का प्रतीक मानते हैं, लेकिन प्राचीन भारतीय दर्शन, सांस्कृतिक परंपराएं और प्राकृतिक संकेत बताते हैं कि कृष्ण द्वारा मोरपंख धारण करना एक सोचा-समझा और गहरे अर्थों से भरा प्रतीक है. तो चलिए आज आपको बताते हैं कि आखिर क्यों भगवान कृष्ण सिर पर मोर पंख धारण करते हैं.

अहंकार पर विनम्रता की जीत का संदेश
मोर अपनी सुंदरता के लिए जाना जाता है, लेकिन साथ ही उसे अहंकार का प्रतीक भी माना जाता है. कृष्ण द्वारा मोर पंख को सिर पर धारण करना इस बात का संकेत है कि सच्ची महानता बाहरी सौंदर्य या घमंड में नहीं, बल्कि विनम्रता में है.

प्रकृति से गहरा जुड़ाव और संतुलन का प्रतीक
श्रीकृष्ण का जीवन वृंदावन की धरती से जुड़ा रहा गायें, जंगल, नदी, पक्षी और पशु उनके जीवन का हिस्सा थे. मोरपंख इस प्राकृतिक जुड़ाव का प्रतीक है. प्राचीन समय में मोर को मानसून का संकेत माना जाता था, जो कृषि आधारित समाज के लिए बेहद महत्वपूर्ण था.

सौंदर्य, लेकिन बिना स्वामित्व के
सोने-चांदी और रत्नों के बजाय कृष्ण का मोर पंख चुनना एक बड़ा संदेश देता है. मोरपंख की कोई व्यावसायिक कीमत नहीं होती, फिर भी वह अत्यंत सुंदर होता है. भगवत गीता में कृष्ण ने कर्म करते हुए फल की आसक्ति छोड़ने की शिक्षा दी है, और मोरपंख उसी वैराग्य भाव को दर्शाता है.

आनंद, खेल और भावनात्मक निकटता का प्रतीक
कृष्ण को ‘लीला पुरुषोत्तम’ कहा जाता है, जो जीवन को आनंद और खेल की तरह जीते हैं. मोरपंख उनकी इसी चंचल, रचनात्मक और आनंदमय प्रकृति को उजागर करता है.

ब्रह्मांडीय दृष्टि और चेतना का संकेत
मोरपंख पर बना 'नेत्र' जैसा आकार कई विद्वानों के अनुसार ब्रह्मांडीय दृष्टि और सर्वज्ञता का प्रतीक है. प्राचीन भारतीय कला में कृष्ण का मोरपंख यह दर्शाता है कि वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि को देखने और समझने वाली चेतना हैं.

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