रामायण में विभीषण को धर्म, सत्य और न्याय का साथ देने वाले पात्र के रूप में वर्णित किया गया है. लंका के राजपरिवार से जुड़े होने के बावजूद उन्होंने भगवान राम का साथ दिया और अधर्म के विरुद्ध खड़े हुए. यही कारण है कि कैथून में उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ पूजा जाता है. मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं, अनूठी परंपराएं और वर्षों पुराना इतिहास इसे आस्था का विशेष केंद्र बनाते हैं.
सजता है 5 दिवसीय मेला
कैथून की सबसे बड़ी पहचान यहां आयोजित होने वाला पांच दिवसीय विभीषण मेला है, जिसका आयोजन हर वर्ष होली के अवसर पर किया जाता है. इस मेले की सबसे अनोखी परंपरा धुलेंडी के दिन हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह परंपरा भक्त प्रह्लाद और भगवान नृसिंह की कथा से जुड़ी हुई है. माना जाता है कि होलिका दहन के बाद क्रोधित हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया था. तब भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर उसका वध किया. इसी घटना की स्मृति में कैथून में धुलेंडी पर हिरण्यकश्यप दहन किया जाता है. देश में ऐसी परंपरा बेहद कम स्थानों पर देखने को मिलती है.
45 वर्षों से चली आ रही परंपरा
करीब 45 वर्षों से यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है. मेले के दौरान आसपास के मंदिरों से देव विमानों की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है, जो विभीषण मंदिर पहुंचती है. धार्मिक अनुष्ठानों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और आतिशबाजी के साथ यह मेला हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है.
जमीन में धंसती जा रही है विभीषण की प्रतिमा
मंदिर परिसर में स्थापित विभीषण की प्रतिमा भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है. मान्यता है कि प्रतिमा का केवल ऊपरी भाग ही दिखाई देता है, जबकि उसका शेष हिस्सा जमीन के भीतर समाया हुआ है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यह प्रतिमा हर वर्ष धीरे-धीरे जमीन में और धंसती जा रही है. इसी रहस्य और मान्यता के कारण श्रद्धालुओं के बीच इस प्रतिमा को लेकर विशेष आकर्षण बना रहता है. मंदिर के पास स्थित प्राचीन कुंड और वहां मौजूद विक्रम संवत 1815 का शिलालेख भी इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है.
भगवान शिव और हनुमान से जुड़ी है मान्यता
मंदिर से जुड़ी एक अन्य पौराणिक मान्यता भी काफी प्रचलित है. कथाओं के अनुसार भगवान राम के राज्याभिषेक के बाद विभीषण ने भगवान शिव और हनुमानजी को कांवड़ में बैठाकर पृथ्वीलोक भ्रमण कराने का संकल्प लिया था. कहा जाता है कि भगवान शिव ने शर्त रखी थी कि जहां कांवड़ धरती को स्पर्श करेगी, वहीं यात्रा समाप्त हो जाएगी. मान्यता है कि कैथून पहुंचने पर कांवड़ का एक भाग जमीन से स्पर्श कर गया. कांवड़ का एक सिरा वर्तमान चारचौमा क्षेत्र में पहुंचा, जहां आज चोमेश्वर महादेव मंदिर स्थित है. वहीं दूसरा सिरा कोटा के रंगबाड़ी क्षेत्र तक पहुंचा, जहां हनुमान मंदिर स्थापित है. जिस स्थान पर विभीषण रुके थे, वहीं आज विभीषण मंदिर स्थित माना जाता है.
महाराज उम्मेद सिंह के शासनकाल में हुआ वर्तमान निर्माण
हालांकि मंदिर की पौराणिक मान्यता लगभग 5000 वर्ष पुरानी मानी जाती है, लेकिन वर्तमान मंदिर संरचना का निर्माण महाराव उम्मेद सिंह प्रथम के शासनकाल में कराया गया था. बाद के वर्षों में समय-समय पर मंदिर का जीर्णोद्धार और विकास कार्य भी किए गए, जिससे इसकी धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान बनी रही.
वक्फ विवाद के बाद भी रहा चर्चा में
हाल के वर्षों में मंदिर की भूमि को लेकर विवाद भी सामने आया था. मंदिर की जमीन पर वक्फ संपत्ति होने का दावा किया गया, जिसके बाद मामला न्यायालय तक पहुंचा. लंबे कानूनी विवाद और सुनवाई के बाद अदालत के फैसले के पश्चात यह मंदिर एक बार फिर चर्चा का विषय बना.
दुनिया का इकलौता विभीषण मंदिर, धुलेंडी पर हिरण्यकश्यप दहन की अनोखी परंपरा, जमीन में धंसती प्रतिमा से जुड़ी मान्यता, पौराणिक कथाओं से जुड़ा इतिहास और हर वर्ष लगने वाला विशाल विभीषण मेला कैथून को धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर अलग पहचान दिलाते हैं. यही वजह है कि हर साल हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचकर विभीषण के दर्शन करते हैं और इस अनूठी परंपरा का साक्षी बनते हैं. आस्था, इतिहास, लोकमान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत का यह अद्भुत संगम कैथून को राजस्थान के प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशेष स्थान दिलाता है.
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