कथा में काशी के एक कर्मकांडी ब्राह्मण की संतान की इच्छा और उसे मिले पांच वर्ष की आयु वाले पुत्र का प्रसंग है. पुत्र के जन्म के बाद पिता उसकी आयु को लेकर चिंतित रहता है और संतों से उपाय पूछता है. उसे बताया जाता है कि बड़ों को प्रणाम करने से आयु, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं. बालक हर साधु और महात्मा को दंडवत प्रणाम करता है तथा चिरंजीवी होने का आशीर्वाद पाता है. सात ऋषि उसे सृष्टिकर्ता और फिर वरदान देने वाले भगवान के पास ले जाते हैं. अंतिम दो दिनों में बालक शिवलिंग से लिपटकर ओम नमः शिवाय का जप करता है. मृत्यु के देवता उसे लेने आते हैं, लेकिन भगवान पांच वर्षों की गणना अपने कालमान से करने का विधान बताते हैं. कथा के अंत में बालक की आयु 12 हजार करोड़ वर्ष से अधिक बताई जाती है और उसे कलियुग में पूजित मुनि के रूप में पहचाना जाता है. देखिए अच्छी बात.