कथा के दौरान श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा गया कि यह पूरा संसार एक सागर की भांति है और इसमें मनुष्य को तटस्थ रहकर ही जीवन व भक्ति दोनों का आनंद मिल सकता है. जैसे मछुआरा जाल फेंकता है तो तट के पास रहने वाली छोटी मछलियां बच जाती हैं, उसी प्रकार परमात्मा के चरणों का आश्रय लेने वाला जीव माया के जाल में नहीं फंसता. जीवन में संसारी और वैरागी दोनों का संतुलन बनाए रखना जरूरी है. जैसे समुद्र की लहरें 24 घंटे अनवरत चलती रहती हैं, वैसे ही मनुष्य के भीतर भी परमात्मा का भजन निरंतर चलता रहना चाहिए. विपत्ति आने पर ही नहीं, बल्कि सुख में भी परमात्मा का स्मरण करना चाहिए. ईश्वर पर अटूट विश्वास ही भक्त को हर परिस्थिति में जीत दिलाता है. देखिए अच्छी बात.