श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम स्कंध में भक्त प्रहलाद के चरित्र और भगवान नरसिंह के अवतार का वर्णन किया गया है। हिरण्यकश्यप ने ब्रह्मा जी से कठिन वरदान प्राप्त करके स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया और राज्य में अपनी पूजा करवाने लगा। हालांकि, उसके पुत्र प्रहलाद बचपन से ही भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। हिरण्यकश्यप के अत्याचारों के बावजूद प्रहलाद की भक्ति अडिग रही। अंततः, प्रहलाद की रक्षा और हिरण्यकश्यप का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने खंभे को फाड़कर नरसिंह अवतार धारण किया। उन्होंने हिरण्यकश्यप को देहरी पर अपनी जांघों पर रखकर उसके सभी वरदानों को निष्प्रभावी करते हुए उसका संहार किया। इसके बाद प्रहलाद की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें अपनी गोद में बिठाया। कथा में मनुष्य जन्म और भारत भूमि में जन्म लेने के दुर्लभ सौभाग्य के महत्व को भी विस्तार से रेखांकित किया गया है।