गणेश महोत्सव भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से आरंभ होता है और अनंत चतुर्दशी, जो इस वर्ष 6 सितंबर को है, को गणेश प्रतिमा के विसर्जन के साथ समाप्त होता है. इस पर्व के नौ दिनों को गणेश नवरात्र कहा जाता है, जिसमें भगवान गणेश की विशेष पूजा, दीपक जलाना, फल, फूल, मिठाई और दूर्वा अर्पित करना, मंत्र जाप और आरती की जाती है. पौराणिक कथा के अनुसार, अनलासुर राक्षस को निगलने के बाद भगवान गणेश को दूर्वा अर्पित करने की परंपरा शुरू हुई. संपत्ति लाभ के लिए लाल फूल, लाल वस्त्र और तांबे का सिक्का अर्पित कर 'ॐ सर्व सौख्य प्रदाय नमः' मंत्र का जाप, रोजगार के लिए अपनी उम्र के बराबर लड्डू चढ़ाकर 'ॐ नमो भगवते लम्बोदराय' मंत्र का जाप, शीघ्र विवाह के लिए 'ॐ विघ्न हर्तरेय नमः' और संतान प्राप्ति के लिए फल की माला अर्पित कर 'ॐ उमापुत्राय नमः' मंत्र का जाप किया जाता है. गणेश प्रतिमा की सूंड की दिशा का भी महत्व है—दाहिनी सूंड मंदिरों के लिए, बाईं सूंड घरों के लिए और सीधी सूंड वाले मोदक गणपति विशेष कामना पूर्ति के लिए माने जाते हैं. विसर्जन के दिन उपवास, नारियल व शमी पत्र अर्पित करने, चमड़े की वस्तुएं न पहनने और भोजपत्र या पीले कागज पर स्वस्तिक बनाकर अपनी समस्याएं लिखकर गणेश प्रतिमा के साथ विसर्जित करने से कष्टों का निवारण होता है. मूषक के कान में प्रार्थना कहने और मिट्टी के चूहे अर्पित कर उसे धन स्थान पर रखने से भी गणपति की कृपा प्राप्त होती है.