ट्रेन हादसे में लकवाग्रस्त हुई थी हाथी, खास बूट के सहारे फिर से चली... दो साल की कड़ी देखभाल से मिली नई जिंदगी

एक दर्दनाक ट्रेन हादसे में हाथी और उसकी मां घायल हो गए थे, जिसमें उसकी मां की मौत हो गई. इस हादसे के बाद बानी लकवा ग्रस्त हो गई थी और उसके बचने की संभावना केवल 2 प्रतिशत बताई गई थी. बानी की पूरी तरह से मदद के लिए डॉक्टरों ने उसके लिए खास जूते तैयार किए.

खास जूतों के सहारे फिर चलने लगी हाथी
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 28 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 2:22 PM IST

तीन साल की हाथी बच्ची 'बानी' आज चलती नजर आती है, लेकिन उसकी यह मुस्कान और चाल एक लंबे संघर्ष का परिणाम है. दरअसल, कुछ समय पहले तक उसकी जिंदगी पर खतरा मंडरा रहा था. एक दर्दनाक ट्रेन हादसे में बानी और उसकी मां घायल हो गए थे, जिसमें उसकी मां की मौत हो गई. इस हादसे के बाद बानी लकवा ग्रस्त हो गई थी और उसके बचने की संभावना केवल 2 प्रतिशत बताई गई थी.

गंभीर हालत में उसे उत्तर प्रदेश के मथुरा स्थित देश के पहले हाथी अस्पताल में लाया गया, जहां वन्यजीव संरक्षण संस्था वाइल्डलाइफ SOS की टीम ने उसका इलाज शुरू किया. शुरुआत में वह हिल भी नहीं पा रही थी. हादसे के चार दिन बाद विशेष स्लिंग की मदद से उसे पहली बार खड़ा किया गया, वह भी सिर्फ पांच मिनट के लिए.

इलाज और थेरेपी से मिला नया जीवन
डॉक्टरों और विशेषज्ञों की टीम ने बानी के इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी. उसे फिजियोथेरेपी, आयुर्वेदिक मालिश, लेजर थेरेपी, हाइड्रोथेरेपी और इलेक्ट्रोएक्यूपंक्चर जैसी कई तकनीकों से उपचार दिया गया. धीरे-धीरे उसकी हालत में सुधार होने लगा. पहले उसकी पूंछ हिली, फिर वह खुद करवट बदलने लगी और कुछ ही हफ्तों में पानी में खड़े होकर संतुलन बनाना सीख गई. मार्च तक उसने चलने की कोशिश शुरू कर दी, हालांकि उसके पिछले पैर अभी भी कमजोर थे. अप्रैल के मध्य तक वह खुद उठने-बैठने लगी और बिना सहारे चलने में सक्षम हो गई.

बनाए गए खास जूते
बानी की पूरी तरह से मदद के लिए डॉक्टरों ने उसके लिए खास जूते तैयार किए. ये जूते नरम पैडिंग और मजबूत सामग्री से बनाए जाते हैं, जिससे उसके पैरों को घिसटने से बचाया जा सके. हर जोड़ी को बनाने में तीन से पांच दिन लगते हैं. शुरुआत में बानी इन्हें उतारने की कोशिश करती थी, लेकिन अब वह इन्हें आराम से पहनकर चलती और दौड़ती है.

हमेशा देखभाल में रहेगी बानी
बानी अब पूरी तरह ठीक तो नहीं हुई है, लेकिन उसकी हालत पहले से काफी बेहतर है. वह अन्य हाथियों के बीच रहकर भी सुरक्षित दूरी पर रखी जाती है, ताकि उसे कोई चोट न लगे. उसकी हालत को देखते हुए उसे जंगल में वापस नहीं छोड़ा जा सकता. विशेषज्ञों का कहना है कि बानी की कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं है. यह न केवल जानवरों के इलाज में नई उम्मीद जगाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि सही देखभाल और प्रयास से असंभव को संभव बनाया जा सकता है.

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