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चीन ने अब धरती पर ही बना डाला खुद का चांद, एस्ट्रोनॉट जब तक चाहें तब तक रह सकेंगे जीरो ग्रैविटी में

कम ग्रेविटी वाला ये नकली वातावरण उस एक्सपेरिमेंट से प्रेरित था जिसे फिजिसिस्ट आंद्रे जीम द्वारा किया गया है. उन्होंने मैग्नेटिक फील्ड की मदद से एक मेंढक को हवा में तैराया था. बता दें, इस एक्सपेरिमेंट के लिए आईजी नोबल प्राइज भी दिया गया था.

चीन ने अब धरती पर ही बना डाला खुद का चांद
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 13 जनवरी 2022,
  • अपडेटेड 2:44 PM IST
  • इस छोटी सी जगह को भी ऐसे बनाया है जैसा माहौल चांद पर होता है
  • लंबे समय तक रह सकेंगे जीरो ग्रैविटी में

चंदा रे चंदा रे कभी तो जमीं पर आ, बैठेंगे बातें करेंगे…..अब ये महज एक गाना नहीं रह गया है. चांद अब सचमुच में जमीन पर आ गया है. ये कारनामा कर दिखाया है चीन ने. आर्टिफिशियल सूरज के बाद अब चीन ने आर्टिफिशियल चांद बना दिया है. इसकी मदद से भविष्य में एस्ट्रोनॉट को मिशन पर भेजने के लिए पहले से तैयार किया जा सकेगा. ये इस तरह से डिजाइन किया गया है कि इसमें ग्रेविटी को जीरो कर दिया गया है. ये ठीक उसी मॉडल पर बनाया गया है जैसा चांद पर होता है. 

एक मेंढक से है प्रेरित 

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, कम ग्रेविटी वाला ये नकली वातावरण उस एक्सपेरिमेंट से प्रेरित था जिसे फिजिसिस्ट आंद्रे जीम द्वारा किया गया है. उन्होंने मैग्नेटिक फील्ड की मदद से एक मेंढक को हवा में तैराया था. बता दें, इस एक्सपेरिमेंट के लिए आईजी नोबल प्राइज भी दिया गया था. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से बात करते हुए जीम ने कहा कि उन्हें इस बात की बेहद ख़ुशी है कि उनका ये एजुकेशन एक्सपेरिमेंट आज स्पेस एक्सप्लोरेशन में काम आ रहा है.

कैसे किया गया है डिजाइन? 

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के मुताबिक, इसे बहुत अलग तरह से तैयार किया गया है. ये एक छोटी सी जगह है जिसे बिलकुल असली चांद की तरह बनाया गया है. इस छोटी सी जगह को भी ऐसे बनाया है जैसा माहौल चांद पर होता है, जैसे चट्टान, धूल आदि. सबसे ख़ास बात एस्ट्रोनॉट को एकदम चांद वाला माहौल देने के लिए इन पत्थरों का वजन भी उतना ही रखा गया है जितना चांद की सतह पर होता है. 

लंबे समय तक रह सकेंगे जीरो ग्रैविटी में  

गौरतलब है कि चांद की ग्रेविटी धरती पर जितनी ग्रेविटी होती है उसके छठे हिस्से के बराबर होती है. इसके लिए मैग्नेटिक फील्ड का इस्तेमाल किया गया है. ताकि एस्ट्रॉनॉट जितनी देर चाहे इसे महसूस कर सके. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये वैक्यूम चेंबर की तरह है और यह एक 2 फीट का कमरा है. यह लूनर सिम्यूलेटर लंबे समय के लिए जीरो ग्रैविटी में रह सकता है.

इससे क्या फायदा होगा?

दरअसल, चीन ने इस दशक के अंत यानि 2030 तक रूस के साथ एक संयुक्त प्रोजेक्ट में अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर भेजने का लक्ष्य रखा है. चीनी विशेषज्ञों की इस योजना ने न केवल चीन में बल्कि दुनिया भर के शोधकर्ताओं के लिए सुविधा खोलने का काम किया है. यह उम्मीद लगाई जा रही है कि इस आर्टिफिशियल चांद से भविष्य के मिशनों में एक रास्ता मिल पाएगा. चंद्रमा के लिए रवाना होने से पहले ही वैज्ञानिकों द्वारा उपकरणों का परीक्षण किया जा सकेगा, साथ ही गलत अनुमानों से बचा जा सकेगा. 

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