आप भी करते हैं खुद से बात? मज़ाक उड़ाती है सोसाइटी.. तो छोड़ें समाज, साइंस की नज़रो में मेंटली बीमार नहीं आप

कई बार लोग जब खुद से बात करते हैं तो लोग सोचते हैं कि यह कोई बीमारी है, जबकि विज्ञान इसका उलट बताता है. विज्ञान के अनुसार ऐसा करने से आपकी फैसले लेने की क्षमता बेहतर होती है और कॉन्फिडेंस भी बढ़ता है.

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gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 23 जून 2026,
  • अपडेटेड 2:31 PM IST

अक्सर हम अपने दोस्तों, परिवार या कलीग्स से अपने दिनभर की बातें और फीलिंग्स शेयर करते हैं. इससे हमें मेंटल पीस मिलता है और हम खुद भी सुकून महसूस करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी खुद से बात की है? 

कई लोग ऐसा करते खुद से बात करते हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि यह कोई अजीब आदत है. हालांकि साइकोलॉजी में अदद के बारे में कुछ और ही कहा जाता है. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि खुद से बात करना पूरी तरह से नॉर्मल है, यहां तक की इसके कई मानसिक फायदे भी हैं.

खुद से बात, क्यों माना जाता अजीब?

सोसाइटी में अक्सर लोग सोचते हैं कि जो इंसान खुद से बात करता है, वह मानसिक तौर पर बीमार होता है. पब्लिकली कई लोग खुद से बात करते हुए दिखते हैं. जिसके बाद लोग कमेंट करते हैं, इसी कारण खुद से बात करने को लेकर लोगों से संकोच रहता है. लेकिन साइकोलॉजी इस आदत को खुशहाल जीवन से जोड़ती है.

क्या है इंट्रापर्सनल कम्युनिकेशन?

साइकोलॉजी में खुद से बात करने को 'इंट्रापर्सनल कम्युनिकेशन' कहा जाता है. यह वह कम्युनिकेशन है जो इंसान अपने भीतर करता है. इसमें मन में चलने वाले थॉट, खुद से सवाल-जवाब करना और कभी-कभी आवाज में खुद से बात करना भी शामिल होता है. यह प्रक्रिया व्यक्ति को अपने विचारों को स्थिति को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है.

मानसिक स्वास्थ्य के लिए कैसे फायदेमंद?

एक्सपर्ट्स के अनुसार पॉजिटिव सेल्फ-टॉक यानी खुद से पॉजिटिव बातें करना ध्यान और फोकस बढ़ाने में मदद करता है. यह फैसले लेने की पावर को बेहतर बना सकता है और याददाश्त को मजबूत करने में भी मदद करता है. कई खिलाड़ी, कलाकार और सफल पेशेवर टेंशन के भरी स्थिति में कॉन्फिडेंस बनाए रखने के लिए पॉजिटिव सेल्फ-टॉक का करते हैं. माना जाता है कि अपनी ही आवाज में खुद से बात करने के दौरान ध्यान भटकने से बचता है.

खुद को आकने का एक तरीका

खुद से बात करना किसी तरह की कमजोरी नहीं बल्कि खुद को आकने का भी एक तरीका है. यह व्यक्ति को अपनी भावनाओं को समझने, फैसलों की तौलने और जीवन के अनुभवों से सीखने में मदद करता है. इसे आप रियल टाइम जर्नलिंग भी कह सकते हैं, जहां व्यक्ति अपने विचारों को तुरंत पेश कर पाता है.

कब बन सकती है चिंता की बात?

अधिकतर मामलों में खुद से बात करना पूरी तरह नॉर्मल होता है. हालांकि मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति अपने विचारों और बाहरी आवाजों के बीच अंतर नहीं कर पा रहा हो या उसे बार-बार ऐसी आवाजें सुनाई देती हों जो उसकी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रही हों, तो यह चिंता का विषय हो सकता है. ऐसी स्थिति में किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है.

 

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