वैक्सीन को सही जगह तक पहुंचाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उसे सही तापमान पर रखना भी है. कई आधुनिक RNA वैक्सीन को बहुत कम तापमान पर रखना पड़ता है. इसके लिए खास फ्रीजर, लगातार बिजली और ठंडी जगह की जरूरत होती है. गांवों और दूरदराज के इलाकों में यह व्यवस्था करना मुश्किल होता है. अब भारत की एक बायोटेक कंपनी ने ऐसी RNA वैक्सीन तकनीक पर काम शुरू किया है, जिसे सामान्य फ्रिज के तापमान पर रखा जा सकता है. अगर यह तकनीक सफल होती है तो भविष्य में वैक्सीन को दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचाना काफी आसान हो सकता है.
RNA वैक्सीन क्या होती है?
हमारे शरीर को जब किसी वायरस से लड़ना होता है तो उसे उस वायरस को पहचानना आना चाहिए. वैक्सीन शरीर को इसी की ट्रेनिंग देती है. RNA वैक्सीन शरीर की कोशिकाओं को एक तरह का संदेश देती है. इस संदेश की मदद से शरीर वायरस के एक खास हिस्से को पहचानना सीखता है और उससे लड़ने के लिए इम्यून सिस्टम तैयार करता है. कोरोना महामारी के दौरान Pfizer और Moderna जैसी कंपनियों की mRNA वैक्सीन इसी तकनीक की वजह से दुनियाभर में चर्चा में आई थीं. इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी नए वायरस की पहचान होने के बाद वैक्सीन तैयार करने की प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया जा सकता है.
RNA वैक्सीन की एक बड़ी दिक्कत उनके रखरखाव को लेकर रही है. कुछ RNA वैक्सीन को बहुत कम तापमान पर रखना पड़ता है. इसके लिए खास फ्रीजर और लगातार चलने वाली कोल्ड चेन चाहिए. अगर किसी गांव में वैक्सीन पहुंचानी है तो सिर्फ वैक्सीन बनाकर भेज देना काफी नहीं है. उसे रास्ते में भी सही तापमान पर रखना होगा. अगर बिजली नहीं है या खास फ्रीजर उपलब्ध नहीं है तो परेशानी बढ़ जाती है. यही वजह है कि दुनिया के गरीब और दूरदराज के इलाकों में आधुनिक वैक्सीन पहुंचाना चुनौती बन जाता है.
भारत की कंपनी ने क्या नया किया?
भारत की Immunoscript Life Science कंपनी RNA वैक्सीन को ज्यादा आसानी से रखने और पहुंचाने वाली तकनीक पर काम कर रही है. इसके लिए कंपनी ने CLNE नाम का एक प्लेटफॉर्म विकसित किया है. आसान भाषा में कहें तो इसमें RNA को एक खास तरह की बहुत छोटी बूंदों की सतह से जोड़ा जाता है. इसके बाद इसे पाउडर के रूप में सुखाया जा सकता है. खास बात यह है कि इसे करीब 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के सामान्य फ्रिज वाले तापमान में रखने की कोशिश की जा रही है. मतलब हर जगह बहुत महंगे और बेहद ठंडे फ्रीजर की जरूरत नहीं पड़ेगी.
इससे आम लोगों को क्या फायदा होगा?
अगर यह तकनीक सफल रहती है तो इसका सबसे बड़ा फायदा उन जगहों को हो सकता है जहां वैक्सीन पहुंचाना आज भी मुश्किल है. गांव, पहाड़ी इलाके और कम सुविधाओं वाले देशों में सामान्य फ्रिज के जरिए वैक्सीन को सुरक्षित रखना आसान हो सकता है. इससे वैक्सीन को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में भी परेशानी कम हो सकती है. किसी बीमारी का बड़ा प्रकोप होने पर लाखों खुराक तेजी से अलग-अलग जगहों तक भेजना आसान हो सकता है.
Self-amplifying RNA क्या है?
इस नई तकनीक में Self-amplifying RNA यानी saRNA का भी इस्तेमाल किया जा रहा है.
सामान्य mRNA वैक्सीन शरीर को एक संदेश देती है. Self-amplifying RNA उस संदेश की शरीर के अंदर अतिरिक्त कॉपी बनाने में भी मदद कर सकता है. इसका मतलब यह हो सकता है कि वैक्सीन बनाने के लिए शुरुआत में कम मात्रा में RNA की जरूरत पड़े. इससे बड़े स्तर पर वैक्सीन बनाने की क्षमता बढ़ सकती है और लागत कम करने में भी मदद मिल सकती है.
अभी वैक्सीन तैयार नहीं, टेस्टिंग बाकी है
यह समझना जरूरी है कि यह तकनीक अभी ऐसी स्थिति में नहीं है कि इसे तुरंत लोगों को लगाया जाने लगे. CEPI ने Immunoscript को करीब 8.9 मिलियन डॉलर तक की फंडिंग दी है. इस पैसे से शुरुआती क्लिनिकल स्टडी की जाएगी. इस स्टडी में रेबीज के खिलाफ बनाई जा रही वैक्सीन को टेस्ट किया जाएगा. देखा जाएगा कि यह इंसानों के लिए सुरक्षित है या नहीं और शरीर में कितनी अच्छी इम्यून प्रतिक्रिया पैदा करती है.