आज दुनिया में लाखों परिवार IVF की मदद से माता-पिता बनने का सपना पूरा कर रहे हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस क्रांतिकारी तकनीक को सफल बनाने के पीछे एक ऐसी महिला का हाथ था, जिसका नाम लंबे समय तक दुनिया की नजरों से दूर रहा. वो महिला थीं जीन पर्डी. जीन पर्डी दुनिया की पहली Embryologist थी जिन्होंने दिन-रात मेहनत कर IVF को लाखों परिवारों के लिए उम्मीद बना दिया.
23 साल की उम्र में शुरू किया ऐसा सफर
जीन पर्डी ने 1968 में महज 23 साल की उम्र में, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के फिजियोलॉजिस्ट रॉबर्ट एडवर्ड्स के साथ रिसर्च असिस्टेंट के रूप में काम शुरू किया. उस समय वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि महिला के शरीर के बाहर अंडाणु और शुक्राणु को मिलाकर भ्रूण बनाया जा सकता है या नहीं.
बाद में इस टीम में स्त्री रोग विशेषज्ञ पैट्रिक स्टेप्टो भी शामिल हुए. तीनों का लक्ष्य था उन महिलाओं की मदद करना, जो बंद फैलोपियन ट्यूब जैसी समस्याओं के कारण मां नहीं बन पा रही थीं.
लैब की हर जिम्मेदारी जीन के कंधों पर थी
रिसर्च के लिए न तो पर्याप्त फंड था और न ही आधुनिक सुविधाएं. एक छोटे से अस्पताल की लैब में यह काम शुरू हुआ. ऐसे में जीन पर्डी ने लैब का पूरा काम संभाला. उन्होंने भ्रूण को विकसित करने के लिए जरूरी कल्चर मीडिया तैयार किया. करीब 10 साल तक सैकड़ों महिलाओं ने इस रिसर्च में हिस्सा लिया. लगातार असफलताओं के बावजूद जीन और उनकी टीम ने हार नहीं मानी.
1978 में दुनिया ने देखा पहला चमत्कार
25 जुलाई 1978 को दुनिया की पहली IVF बेबी लुईस ब्राउन का जन्म हुआ. यह मेडिकल साइंस की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना गया. इसके कुछ महीनों बाद जनवरी 1979 में पहला IVF बेबी बॉय एलिस्टेयर मैकडोनाल्ड भी पैदा हुआ. हालांकि इस ऐतिहासिक सफलता का श्रेय ज्यादातर रॉबर्ट एडवर्ड्स और पैट्रिक स्टेप्टो को मिला, जबकि जीन पर्डी का योगदान लंबे समय तक पर्दे के पीछे ही रहा.
दुनिया का पहला IVF क्लिनिक बनाने में भी निभाई भूमिका
IVF की सफलता के बाद भी ब्रिटेन की सरकारी स्वास्थ्य सेवा (NHS) ने इस तकनीक को तुरंत समर्थन नहीं दिया. ऐसे में टीम ने निजी क्लिनिक शुरू करने का फैसला किया. जीन ने ही कैम्ब्रिज के पास एक पुरानी इमारत खोजी, जिसे बाद में Bourn Hall के नाम से दुनिया का पहला IVF क्लिनिक बनाया गया. 1980 में यहां फर्टिलिटी सेवाएं शुरू हुईं और जीन पर्डी इसकी टेक्निकल डायरेक्टर बनीं. उनके जीवनकाल में ही यहां IVF से 500 से ज्यादा बच्चों का जन्म हुआ.
39 साल की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा
जीन पर्डी का 16 मार्च 1985 को स्किन कैंसर से निधन हो गया. वह सिर्फ 39 साल की थीं. बीमारी के दौरान भी उन्होंने अस्पताल छोड़ने के बजाय टीम के साथ जुड़े रहना पसंद किया. उन्होंने 1970 से 1985 के बीच IVF पर 26 रिसर्च पेपर लिखे, जो Nature और The Lancet जैसी जर्नल्स में प्रकाशित हुए.
सालों बाद मिला असली सम्मान
IVF की सफलता के करीब 20 साल बाद रॉबर्ट एडवर्ड्स ने सार्वजनिक मंच से कहा था, IVF के केवल दो नहीं, बल्कि तीन मूल आविष्कारक थे. यह तीसरा नाम जीन पर्डी का था. 2018 में दुनिया की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी लुईस ब्राउन ने जीन की कब्र पर फूल चढ़ाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी.
आज करोड़ों परिवारों की उम्मीद है IVF
आज IVF दुनिया भर में बांझपन के इलाज का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है. लाखों बच्चे इस तकनीक की मदद से जन्म ले चुके हैं. हर 25 जुलाई को World IVF Day मनाया जाता है. यह दिन सिर्फ मेडिकल उपलब्धि का जश्न नहीं, बल्कि जीन पर्डी जैसी उन वैज्ञानिकों को याद करने का भी अवसर है, जिनकी मेहनत ने असंभव को संभव बना दिया.